बुधवार, 9 जनवरी 2013
शनिवार, 5 जनवरी 2013
उभार की सनक
जय सिंह
इस लेख को पढ़कर आपको हैरानी हो रही है कि युवा सोच युवा खयालात यह क्या लिख रहा है। लेकिन जनाब यह मैं नहीं हिन्दी की बेहद लोकप्रिय पत्रिका इंडिया टूडे अपने नए अंक की कवर स्टोरी "उभार की सनक" के साथ उक्त पंक्ति को लिख रही है। जो अंक उसने मई महीने के लिए प्रकाशित किया है।
इसको लेकर बुद्धजीवियों व मीडिया खेमे में बहस छिड़ गई कि एक पत्रिका को क्या हो गया वो ऐसा क्यूं कर रही है। मुझे लगता है कि इसका मूल कारण कंटेंट की कमी और ऊपर से बढ़ता महंगाई का बोझ है। पत्रिका खरीदने से लोग कतराने लगे हैं । ऐसे में भला जॉब खोने का खतरा कोई कैसे मोल ले सकता है I जाहिर सी बात है कि अगर आमदनी नहीं होगी तो जॉब सुरक्षित नहीं रहेगी I हो सकता है कि इस बार इंडिया टूडे ने अपनी गिरती बिक्री को बचाने के लिए इस तरह की भाषा व पोस्टर का प्रयोग किया हो।
मगर दूसरी ओर देखें तो शायद इंडिया टूडे कुछ गलत भी नहीं कह रहा I आज सुंदर बनना किसे पसंद नहींI युवा रहना किसकी चाहत नहीं I खुद को सबसे खूबसूरत व युवा दिखाने की होड़ ने लाइफस्टाइल दवा बाजार को संभावनाओं से भर दिया I व्यक्ति आज बीमारी से छूटकारा पाने के लिए नहीं I बल्कि सुंदर व आकर्षित दिखने के लिए दवाएं खा रहा है। बाजारों में खुबसूरत बनाने की दवाईयों से पटा हुआ है। आज के सारे लड़के एवं लडकीयाँ सुन्दर दिखने के लिए प्रयोग कर रहे है । अगर यह बात सच नहीं तो आए दिन अखबारों में ग्रो ब्रेस्ट व मर्दाना ताकत बढ़ाओ जैसे विज्ञापनों का खर्च कहां से निकलता है अगर वह बिकते नहीं। जवाब तो सब के पास है।
शायद ऐसे विषयों पर स्टोरी करना तब गलत नजर आता है जब यह स्टोरी केवल बीस फीसद हिस्से पर लागू होती हो। इन चीजों के आदी या तो मायानगरी में बसने वाले सितारें हैं या फिर कॉलेजों में पढ़ने वाले कुछेक छात्र छात्राएं या फिर सुंदरता के दीवाने पुरुषों की कसौटी पर खरी उतरने ललक में जद्दोजहद कर रही महिलाएं। मगर मजबूरी का दूसरा नाम तो आप सभी जानते हैं। शायद इंडिया टूडे की भी कोई मजबूरी रही होगी इस स्टोरी को इस तरह कवर स्टोरी बनाने के पीछे।
वैसे इंडिया टूडे ने एक शब्द का इस्तेमाल किया है सनक I सनक अर्थ शायद क्रेज या चलन होता है। और जब भी किसी चीज का चलन बढ़ता है तो मीडिया उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से पीछे तो कभी हटता नहीं I फिर इस चलन को लेकर इंडिया टूडे ने पहले मोर्चा मार लिया कह सकते हैं। हर आदमी को क्रेज ने मारा है I किसी को अगले निकलने के I किसी को रातोंरात सफल अभिनेत्री बनने के I किसी को अपने सह कर्मचारियों को पछाड़ने के I किसी को अपने प्रतियोगी से आगे निकलने के। अब हिन्दी समाचार चैनलों को ही देख लो I एक दूसरे से पहले स्टोरी ब्रेक करने के क्रेज ने मार डाला I स्टोरी ब्रेक करने के चक्कर में भाषा का सलीका बदल जाता है I एक न्यूज रिपोर्ट या एंकर क्रोधित हो उठता है। पंजाब में प्रकाशित होने वाले पंजाब केसरी के फिल्मी दुनिया पेज की कॉपियां सबसे ज्यादा बिकती हैं I क्यूंकि वह वो छापता है I जो कोई दूसरा नहीं छापता I ऐसे में उसका मुकाबला करने के लिए दूसरे ग्रुपों को भी उसी दौड़ में शामिल होना पड़ेगा I क्यूंकि पैसा नचाता है I और अश्लीलता बिकती है।
अश्लीलता बिकती है व पैसा नचाता है से याद आया I पूजा भट्ट व महेश भट्ट को ही देख लो I आखिर कैसा सनक है कि बाप बेटी जिस्म-2 को लेकर बड़े उत्सुक हैं I सन्नी लियोन को लेने का फैसला महेश भट्ट ने किया I और फिल्म बनाने का पूजा भट्ट ने I वहां बाप बेटी के बीच सब कुछ नॉर्मल है I उनको कुछ भी अजीब नहीं लगता I ऐसा लगता है कि पैसे की चमक हर चीज को धुंधला कर देती है I तो शर्म हया क्या भला है।
चलते चलते इतना ही कहूंगा कि पैसा नचाता है I दुनिया नाचती है। शायद इंडिया टूडे हिन्दी पत्रिका वालों की भी कुछ ऐसी ही कहानी होगी वरना इतनी इज़्ज़तदार पत्रिका ऐसी स्टोरी को इस तरह एक्सपॉज नहीं करती I वैसे भी मीडिया में कुछ वर्जित नहीं रहा। जो मीडिया आज इंडिया टूडे पर उंगली उठा रहा है I वही मीडिया विदेशी महिला अदाकारों की उस बात को बड़ी प्रमुखता से छापता है I जिसमें वह कहती हैं उसने कब कौमार्य भंग किया I कितनी दवाएं व सर्जरियां करवाकर अपनी ब्रेस्ट का साइज बढ़ाया। इतना ही नहीं I कुछेक न्यूज वेबसाइटों पर तो एक कोने में अभिनेत्रियों की हॉट से हॉट तस्वीरें रखी मिलेगीं I और लिखा मिलेगा एडिटर की चॉव्इस I अगर एडिटर की चॉव्इस ऐसी होगी तो अखबार कैसा होगा, मैगजीन कैसी होगी जरा कल्पना कीजिए I मैं फिर मिलूंगा किसी दिन किसी नई चर्चा के साथ। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
आपका --------- जय सिंह
रविवार, 23 दिसंबर 2012
हर रोज बलात्कार !
इन दिनों देश के हर अखबारों, समाचार चैनलों, राजनीतिक, सामाजिक, और धार्मिक इलाकों मे क्रमश: तरह-तरह के भाषा और शीर्षक में स्त्री पर बलात्कार और छेड़छाड़ का आलम पुर असर है। उत्तर प्रदेश हो या देश की राजधानी दिल्ली कहीं भी लड़कियां सुरक्षित नही है। आये दिन बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं से पुरा अखबार पटा रहता है। कोर्इ भी जगह सुरक्षित नही है। रास्ते में मनबढ़ लड़कों द्वारा, स्कूल-कालेजों में टीचर द्वारा, घर में रिश्तेदारों द्वारा, थाने में सिपाहियों द्वारा, महिला के साथ बलात्कार या छेड़छाड़, ऐसे समाचार रोज देखने और पढ़ने को मिल रहे है। दिल्ली में चलती बस में एक लड़की के साथ सामुहिक बलात्कार का मामला दिल को दहला देने वाली है।
दिल्ली पुलिस ''हेल्पलाइन'' अभियान चलाने वाले चाहे जितने दावे कर ले, पर सच यह है कि भारत के किसी भी बड़े शहर के मुकाबले देश की राजधानी दिल्ली में महिलाएं सबसे कम सुरक्षित है। यहां प्रतिदिन एक से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज होते है और छेड़छाड़ एवं यौन उत्पीड़न की दो से अधिक घटनाएं प्रकाश में आती है। ''नेशनल क्राइम रिकार्डर्स ब्यूरो'' के आंकड़ों के मुताबिक हर साल देश के सभी बड़े शहरों में कुल मिलाकर बलात्कार के जितने मामले दर्ज होते है उनमें एक-तिहार्इ से ज्यादा मामले अकेले दिल्ली शहर के होते है। इसी तरह छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के मामले में भी दिल्ली शहर का ग्राफ सबसे उपर रहता है। महानगरों एवं प्रमुख राज्यों की राजधानियों समेंत सभी बड़े शहरों में महिलाओं से छेड़छाड़ एवं उत्पीड़न के जितने मामले दर्ज होते है उनमें से करीब 25 फीसदी मामले अकेले दिल्ली के होते है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक सबसे ज्यादा दिल्ली शहर में ही ''चाइल्ड रेप'' की घटनाएं होती है। छोटी लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की 80 फीसदी घटनाओं में खुद अभिभावक ही लिप्त पाये गये है।
बलात्कार चाहे उसे समाज के माथे का कलंक कहिए या आधी दुनिया की विवशता या पुरूषसत्ता की गुंडागर्दी, लेकिन यह यानी बलात्कार रोज होता है। ज्यादातर मामले को तो पुलिस वाले दर्ज ही नही करते है। यदि किसी तरह से दर्ज हो भी जाते है तो उनमें अधिकतर मामलों की कोर्इ जांच-पड़ताल नहीं करता, ऐसे मामले खबर की सुर्खियों में भी नही आते। खबर तब बनती है, जब कोर्इ बड़ा हादसा हो जाता है। टेलीविजन पर आ जाने के बाद सब कुछ एक ''इवेंट'' का रूप ले लेता है। आज के दौर की विडम्बना यह है कि किसी भी विषय पर बना-बनाया कोर्इ भी सैद्धातिंक सूत्रीकरण काम नहीं आता। नये तर्क और कुतर्को का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। पहले कहा जाता था कि जब लोकतंत्र प्रौढ़ता हासिल कर लेगा और आधुनिकता की बयार बह चलेगी, तब समाज में बलात्कार जैसी जघन्य कृत्य स्वत: समाप्त हो जायेगी। लेकिन यह बात भी गलत साबित हो रही है। पशिचम में आधुनिकता की आंधी बहते-बहते अब थमने की कगार पर पहुचने को है, लेकिन आंकड़े बताते है कि उन देशों में बलात्कार जैसे अपराधों की दर घटी नहीं है। भारत के महानगर पशिचम के किसी आधुनिक शहर में कम नहीं है, लेकिन यहां भी बलात्कार का ग्राफ सबसे ऊपर दिल्ली और मुंबर्इ का है। इस समय एक तर्क यह भी चल निकला है कि नग्नता की हद तक आधुनिक संस्कृति भी यौन उत्पीड़न का रास्ता खोलती है। इसको काटता दूसरा तर्क भी जायज है कि अगर यही सही है, तो फिर भंवरी देवी, हनीफा खातून, कुमारी मथुरा और रोज कोर्इ न कोर्इ लड़की बलात्कार की शिकार क्यों होती है और लगभग निर्वस्त्र घूमती ''माडल युवतियों'' के साथ बलात्कार क्यों नही होता।
बलात्कार को लेकर महिला संगठन द्वारा समय-समय पर सर्वेक्षण होते रहते है। करीब दो वर्ष पहले हुए ऐसे ही एक सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में बलात्कार के 16 फीसदी मामले ही पुलिस थाने में दर्ज हो पाते हैं। बलात्कार की शिकार करीब 84 प्रतिशत औरतें विभिन्न तरह के दबावों के चलते शिकायत करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पातीं। आंकड़ों से यह भी पता चला कि बलात्कार की शिकार महिलाओं में करीब एक-तिहार्इ की उम्र 16 वर्ष से कम होती है। ग्रामीण अंचलों में तो बमुशिकल एक प्रतिशत मामले ही दर्ज हो पाते हैं। सबसे शर्मनाक तो यह है कि 100
में से मात्र 4 बलात्कारियों को ही अदालत से दंड मिल पाता है, बाकी 94 का कुछ नहीं बिगड़ता है। वे समाज में सरेआम सीना तानकर घूमते रहते हैं। एक तथ्य यह भी उजागर हुआ है कि बलात्कार की शिकार 100
महिलाओं में करीब 84 महिलाएं बलात्कारी को अच्छी तरह पहचानती हैं और 10 में से 3 बलात्कारी तो उसका पड़ोसी होता है। यही नहीं 100
में से लगभग 3 फीसदी बलात्कारी तो परिवार के ही सदस्य होते हैं। इसके बावजूद भी पीडि़त महिला को अदालत से न्याय नहीं मिल पाता है। किशोरियों के विरूद्ध लगातार बढ़ रहे यौन हिंसा के कारणों की विस्तार से खोजबीन अनिवार्य है। एक तरफ मीडिया में बढ़ते यौन चित्रण, पारिवारिक विखंडन, लचर कानून और न्याय व्यवस्था, ज्यादातर अपराधियों का बाइज्जत बरी हो जाना अपराधियों को बेखौफ बनाती है, मगर फैसले होने में बरसों की देरी और महंगी कानूनी सेवा, चुप रहने को मजबूर पीडि़त युवा स्त्री विरोध-प्रतिरोध कर सकती है, इसलिए भी लड़कियों के साथ बलात्कार की घटना बढ़ रही है। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत करना पुरूष की घृणित मानसिकता का परिचायक एवं समाज के ऊपर कलंक है।
लेखक- जय सिंह
उप-संपादक,
''आधुनिक विप्लव'' हिन्दी मासिक पत्रिका
मोबाइल नं0-9450437630
e-mail- jaisingh35us@yahoo.com
Blog- http://jaisingh-apnibaat.blogspot.com
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


