शुक्रवार, 9 मई 2014

यूँ बात-बात पर रूठा न करो .............


प्यार है तो तकरार भी होगी, जरुरत बस इतनी है की दिलबर की बातों को न ले दिल पर ......


अक्सर ऐसा होता है कि एक दूसरे को अच्छी तरह समझने का दावा करने और अत्यधिक प्रेम करने वाले प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी में भी छोटी- छोटी बातों पर तकरार हो जाती है | वे एक दूसरे से रूठ जाते है और उनके बीच अबोला चलने लगता है |
झगड़े के मसालों को यों ही बातचीत किए बिना या सुलझाये बिना छोड़ देना आपके रिश्ते के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है | हर बार पार्टनर के एक ही रवैये को लेकर मन में गुस्सा इकठ्ठा करना समस्या को और बाधा देता है | एक दूसरे पर दोषारोपण करने गलतियों को गिनाने और एक दूसरे की बात को नकारने से बेहतर होगा कि आप सार्थक बातचीत से आपसी विसंगतियों को दूर करने की कोशिश करें | आपसी समझदारी से काम लेकर आप अपने रिश्ते को मधुर बनाने का प्रयास करें |

क्यों होती है तकरार ?

v  एक दूसरे की बात ध्यान से न सुनना |
v  किसी एक का आलसी होना या हमेशा देरी से पहुचना |
v  दोस्तों की अत्यधिक तारीफ करना |
v  एक दूसरे को उपहार न देना |
v  जाने – अनजाने में कोई गलती हो जाने पर उसे स्वीकार न करने पर 
v  जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ जैसी महत्वपूर्ण तारीखें भूल जाना |
v  आर्थिक स्तर को लेकर भी वैवाहिक जोड़ो में बहस हो जाती है |
v  एक दूसरे को फोन न करना और फोन पर हाल चाल हमेशा न लेना |
v  किसी से फोन पर बात चीत करते समय एक दूसरे का फोन आने पर व्यस्त टोन होने पर तरह तरह के सवाल करने पर |
v  किसी एक का गलत संगत या गलत आदतों की गिरफ्त में आ जाने के कारण |
v  घरेलु कामों को लेकर भी अकसर पति पत्नी के बीच विवाद का मुद्दा बन जाता है |
v  किसी पुराने अफेयर या मित्रता का बारे में पता चलने पर |
v  एक दूसरे के मन में शक या अविश्वास पैदा हो जाने के कारण भी विवाद की स्तिथि पैदा हो जाती है |
v  एक दूसरे से अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए बात करने पर |
v  किसे दूसरे से एक दूसरे की तुलना करने और उसे बेहतर बनाने पर |

कैसे करे तकरार का समाधान


v  अपनी समस्याओं से एक दूसरे को अवगत कराएँ |
v  अपने साथी को समस्याओ को समझने का पूरा मौका दें |
v  बात को समझने के लिए स्वंय को अपने पार्टनर की जगह रखकर देखें |
v  पार्टनर की बातो को ध्यान से सुने |
v  जाने – अनजाने में कोई गलती हो जाने पर उसे स्वीकार करना सीख ले और दुबारा गलती न करने का भरोसा दिलाए |
v  एक बार में एक ही समस्या के बारे में बताएं | लड़ाई सुलझाते समय पिछली सारी गलतियों को गिनाना प्रारंभ न करें | इससे समस्या सुलझने के बजाय उलझ जाती है |
v  तकरार का समाधान करते समय अपना आपा न खोएं | शांति बनायें रखें | उचित शब्दों में अपनी बात कहें | इस दौरान सामने वाले को दुःख पहुँचाने की मंशा कदापि नहीं होनी चाहिए |
v  अगर आपको लगता है कि बातचीत के दौरान तनाव और गलतफहमी बढ़ रही है तो बात चीत वही ख़त्म करके अपना पक्ष किसी और तरीके से अपने पार्टनर तक पहुंचाए | जैसे लिखकर, ई मेल द्वारा या अपने किसी खास दोस्त की मदद से |
v  जब भी एक पक्ष को झगड़े में अधिक क्रोध आ रहा हो तो स्पर्श का जादू चलायें | अपने साथी के कंधे पर या हाथ आश्वासन तथा स्नेह भरा स्पर्श दें | तकरार के दौरान गुस्से को शांत करने का यह बेहतरीन तरीका है |
v  जब आपस में झगडा होने लगे तो एक पक्ष को एकदम शांत हो जाना चाहिए | दूसरा अपने आप चुप हो जायेगा | एक दूसरे की प्रतिक्रिया करने से विवाद बढ़ता जायेगा |

प्रस्तुति--- 

----------  जय सिंह ..............


युवा कवि, ब्यंग्कार, कहानीकार 

सोमवार, 5 मई 2014

कहानी------ कठिन डगर



किसी ने ठीक ही कहा है सफर यात्रा शब्द का वास्तविक अभिप्राय अंग्रेजी भाषा के सफर शब्द में छिपा है। मै लम्बे समय तक इसकी भुक्तभोगी रही हूं। एक दो नहीं पूरे तीन साल हमने इस सफर के मजे लिए है। उन दिनों हम बाराबंकी में रहते थे और पढने के लिए लखनऊ आया जाया करते थे। हमारी भाषा में इसे अप-डाउन कहा जाता है। जब लखनऊ विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया तब सोचा था कि मुश्किल से एक घण्टे का सफर है यूं ही निकल जाएगा। लेकिन यकिन मानिये इस एक घण्टे का एक-एक पल बेहद भारी होता है। मेरी हमसफर एक सहेली भी थी। शुरू-शुरू में हम दोनों फैजाबाद पैसेन्जर से अप डाउन किया करते थे। इसके लिए हम आठ बजे सुबह घर छोडते तो शाम को सात बजे वापस लौटते। सहेली जरा कमजोर दिल की थी| दो दिन में हाथ खडे कर दिये। कहने लगी लौटने में रात हो जाती है। अभी ये हाल है तो जाडे में क्या होगा उस पर सात घण्टे आने-जाने में ही लग जाते है। मैने खूब मान मनौवल की दोस्ती का हवाला दिया। वरना वह तो कालेज छोडने का पूरा मन बना चुकी थी। दूसरे दिन हमें स्टेशन पहुंचने में थोडी देर हो गयी और फैजाबाद पैसेन्जर सामने से निकल गयी। अब क्या करें। सोचा दूसरी ट्रेन से चलते है। 8 बजकर 40 मिनट पर गोण्डा पैसेन्जर आयी। जिस डिब्बे में हम घुसे उसी में लडकों का जत्था घुस गया। ट्रेन में पैसेन्जर कम थे। वे लड़के हमारे सामने की सीटों पर बैठ गए। फिर कर्इ जोडी आंखे हम पर टिक गयीं। वे सिर से पांव तक इस तरह हमारा मुआयना कर रहे थे कि मानों पढने के लिए अप-डाउन का फैसला करके कोर्इ जुर्म किया हो। हम नजरें नीची किये बैठे रहे। तभी उनमें से एक बोला-अबे नीचे क्यों देख रहा है। दूसरा बोला- ताकि कोर्इ सैंडिल न चुरा लेकर जाए फिर पहले वाला लडका बोला- लेकिन सैंडिल है अच्छी। (मन मे आया कि कह दूं कि तेरे सिर पर पडेगी तो और अच्छी लगेगी लेकिन चुप ही रहने में बेहतरी समझी) तभी दूसरा बोला- अबे पैर क्यों हिल रहे है। (दरअसल मेरे पैर हिलाने की आदत ने उन्हे एक और मुददा दे दिया)
पहला बोला- ट्रेन क्यों हिल रही है।
दूसरा बोला- नही बे। लगता है पोलियो हो गया है। इतना कहना था कि मेरे पैर अपने आप ही हिलना भूल गये।
दूसरा फिर बोला- देख ठीक हो गया। और ट्रेन के डिब्बे में एक जोर का ठहाका गूंज उठा। मेरे आंखो से आंसू निकलते निकलते रह गये।) तभी मेरी सहेली अपने सरकते हुए दुपटटे को संभालने लगी। तुम-ओढो मेरी जान दुपटटा संभाल के  ़ ़़ ़ ़ ़। यह कोरस गीत तालियों के साथ उस डिब्बे को गुलजार करने लगा। हम बस तिलमिलाकर रह गये। कर भी क्या सकते थे हम दो और वे आठ-दस। उनकी घूरती नजराें से बचने के लिए हम अपनी किताबें निकालकर पढने लगे तभी उनमें से एक बोला-अरे इतना मत पढो वरना टाप कर जाओगी। बादशाह नगर स्टेशन तक यह सिलसिला चलता रहा और हम उन लडकों के लिए मजाक का विषय बनकर हर पल अपमान का घूंट पीते रहे।

वैसे बाद में मैने यह महसूस किया कि ट्रेन से अप-डाउन करने वाली लडकियों को किताबाें से प्यार हो ही जाता है। यह बात और है कि उसका इस्तेमाल वे पढने के लिए नहीं बल्कि मनचले लड़कों की घूरती नजरों से बचने के लिए करती है।
उस दिन कालेज पहुचते-पहुचते सवा बारह बज गये। पहला लेक्चर खत्म हो चुका था, दूसरा शुरू हो चुका था। सोचा पीछे से क्लास में घुस जाएंगेे लेकिन टीचर ने देख लिया और बाहर खडा कर दिया। उसी दिन हमें पता चला कि 3:40 बजे छोटी लाइन से बरौनी एक्सप्रेस जाती है। हमें छोटी लाइन पता ही न थी हमें तो सिर्फ एक ही लाइन पता थी यह कि साढे पांच बजे फैजाबाद पैसेन्जर मिलेगी। रिक्शे वाले से पूछा तो कहने लगा- पंद्रह रूपये पडेगेे। क्या करते पांच के बजाय पंद्रह रूपये देकर भागते-भागते स्टेशन पहुंचे तो नामुराद टी०टी० ने रोक लिया कि एमएसटी दिखाओ। बरौनी एक्सप्रेस का प्लेटफार्म नम्बर पता करके जब तक हम पहुचे तब तक ट्रेन चल चूकी थी गार्ड हरी झण्डी दिखा चुका था। ट्रेन जा रही थी हम उदास मन से उसे विदा दे रहे थे। आंखों के सामने से ट्रेन निकल जाने का दर्द उस दिन के बाद भी कर्इ बार सहना पडा।
 कभी टीचर ने पांच मिनट ज्यादा पढा दिया तो कभी रिक्शा मिलने में थोडी सी देर हो गयी। आंखो के सामने से जब ट्रेन निकल जाती है तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी दस दिन के भूखे के सामने से निवाला छीन लिया गया हो और जो कभी दौडकर पकड़ लिया तो लगता है किला फतह कर लिया। पर उस दिन तो स्थितिया हमारे पक्ष में न थी । पूछताछ केन्द्र से पता चला कि सवा चार बजे गोण्डा पैसेन्जर जाएगी। गोण्डा पैसेन्जर से आने का मजा हम सुबह ही उठा चुके थे। 8:40 बजे बाराबंकी से चले तो 11:50 बजे लखनऊ पहुचे थे। लेकिन क्या कहें बुरा वक्त आता है तो सब बुरा ही होता है। बालमन ने दृढ़ता दिखायी। जल्दी घर पहुचने की चाहत ने जोर मारा। कहां सवा चार कहां साढे पांच बजे बस फिर क्या था सुबह का सफर भुलाकर हम लोग बैठ और साथ ही हमारा दुर्भाग्य भी। मल्हौर रेलवे स्टेशन पर जो ट्रेन रूकी तो फिर चलने का नाम ही नहीं ले रही थी। साढेे पाच से छ: फिर साढे सात बज गये। अंधेरा हो गया किसी को कुछ पता नही कब चलेगी। एक तो उस ट्रेन में वैसे भी कम लोग होते है और उस पर लडकों का झुण्ड। विचित्र प्रणियों का सफर तो तफरीबाजी में ही कटता पर किया भी क्या जा सकता था। जैसा कि मैं पहले ही कह चूकी हूं कि हमारी सहेली जरा कमजोर दिल की थी। लगी बुक्का फाड के रोने। मैने लाख समझाया चुप रहो। पर वो कहा मानने वाली थी । 
डिब्बे में हमदर्दी का तांता लग गया। मैंनें कहा- भगवान के लिए तमाशा मत बनाओ उसका सुबकना फिर भी बन्द नही हुआ। बगल से एक दो नहीं मालगाडी मिलाकर कुल सात गाडियां गुजरी। तभी एक एक्सप्रेस ट्रेन दुसरी पटरी पर रूकी। सबने कहा वो एक्सप्रेस है तो पहले ही जायेगी। हम दोनों भी पैसेन्जर छोड़ एक्सप्रेस पर जा बैठे पर उसने भी साथ न दिया और पैसेन्जर चली गयी। अब तो मेरा भी धैर्य जबाब दे गया। आंखो से आंसूू छलक पड़े। कुल मिलाकर रात नौ बजे हम बाराबंकी स्टेशन पहुचे। हमारे चाचा जी और हमारी सहेली के पापा जी स्टेशन पर हमारा इंतजार कर रहे थे। दूसरे दिन वो मनहुस खबर सुनने को मिल ही गयी जिसके न मिलने की हम दुआ कर रहे थे। हमारी सहेली ने ठान लिया कि अब पढार्इ छोड देगी और अगले साल बाराबंकी से बीए करेगी। अब बची मै हर रोज लडको के कमेन्ट सहने के लिये और वेसे इनसे बचने के लिए मैने एक रास्ता निकाला। बैठने से पहले मै ट्रेन में महिलाओं की तलाश करती और उसी वर्थ पर बैठती जिस पर कोर्इ आण्टी जी बैठी होती।
अप-डाउन के दौरान ट्रेन के सफर से जुड़ी एक रोचक घटना तब हुर्इ जब मै और दो सहेलियां गोरखनाथ एक्सप्रेस में बैठ गये। पिता जी ने बताया था कि लखनऊ से गुजरने वाली सारी ट्रेन बाराबंकी स्टेशन पर रूकती है। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि हमारे पिता जी का रेलगाडी ज्ञान जरा कम था, क्योंकि वास्तव में गोरखनाथ एक्सप्रेस सीधे गोण्डा जाकर रूकती है।  जब हमें यह बात पता चली तो हमारे हाथ-पांव फुल गये। करीब साढे़ पांच बजे गोरखनाथ एक्सप्रेस बाराबंकी स्टेशन पार कर गयी। हम गेट पर खड़े के खड़े रह गये। मन में अजीब -अजीब खयाल आ रहे थे ढार्इ घण्टे में गोंडा पहुचेंगे वहां से पैसेन्जर ट्रेन पकड़कर वापस बाराबंकी आना रात के ग्यारह बारह बज जाएंगे टिकट भी नहीं है कहीं टी टी ने पकड़ लिया तो। यह सब सोचकर दिल बैठा जा रहा था। तभी जहांगीराबाद स्टेशन पर ट्रेन रूक गयी वैशाली एक्सप्रेस की क्रासिंग थी। मै ट्रेन से कूद पड़ी। इत्तेफाक से दो शख्स और भी ऐसे थे जिन्हें बाराबंकी उतरना था। जहांगीरा बाद स्टेशन मतलब एक बरगद का पेड़। हमने एक व्यक्ति से पूछा भार्इ साहब यहां रिक्शा कहां मिलेगा।
जवाब मिला- कहीं नहीं।
मैनेे कहा- बाराबंकी जाना है।
जबाब मिला- ढार्इ घण्टे इन्तजार करो पैसेन्जर ट्रेन आएगी, चले जाना।
मैं फिर जोड़-घटाने में उलझ गयी छ: बज रहे है ढ़ार्इ घण्टे मतलब साढ़े आठ, फिर आधा घण्टा बाराबंकी पहुंचने में।
मैने फिर पूछा- भार्इ साहब टैम्पो तो चलती है।
जवाब मिला- हां यहां से चार-पांच किलोमीटर पैदल जाइए तो चौराहे पर टैम्पो मिल जाएगी।
उन दोनो अंकलों के साथ हम तीनाें उस सुनसान रास्ते पर निकल पड़े। दोनों तरफ जंगली झाड़ उसके आगे खेत बीच में संकरी सी पगडण्डी खैर करीब पौन घण्टा पैदल चलने के बाद हम चौराहे पर पहुंचे तो टैम्पो निकल गयी। दूसरे टैम्पो वाले से पूछा कि तुम कब चलोंगे तो बोला- सवारी मिलेगीं तो जाएगें वरना नहीं जाएगे। फिर दोनो में से एक अंकल जिनके पास सामान ज्यादा था, वे जम्मू से आ रहे थे और आर्मी पर्सन थे, ने टैम्पो रिजर्व की तब जाकर हम घर पहुंचे।

छेड़छाड़ की मामूली सी दिखने वाली घटनाएं कभी-कभी  भयानक रूप ले लेती है। ऐसा ही एक वाकया महिला कालेज में पढ़ने वाली एक लड़की के साथ हुआ। ट्रेन से आते-जाते कर्इ बार हमारी मुलाकात हुर्इ थी जिससे हमारे बीच अच्छी जान-पहचान भी हो गयी थी। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। हुआ यूँ कि एक लड़के की छीेटाकशी के जवाब में उसने दस लडके को जमकर लताड़ा। भीड़ के दूसरे सदस्यों ने भी उसका साथ दिया और उस लड़के को एक दो झापड़ भी रसीद कर दिया। तब से वह लड़का हर समय उसे सबक सिखाने की फिराक में रहता। बात इतनी बढ़ गयी कि लड़की कुछ दिनाें तक बस से अप-डाउन करने लगी। इत्तेफाक से उस दिन बसों की हड़ताल थी और उसके प्रेक्टिकल इमितहान थे। उसने एक बार फिर ट्रेन का सहारा लिया। बदकिस्मती से लौटते वक्त मेमू ट्रेन के जिस डिब्बे में वह चढ़ी उसमे भीड़ कम थी। कुछ देर बाद चार लड़के हाथों में सुलगी सिगरेट लिए उसके सामने वाली सीट पर बैठ गये। किसी अनहोनी के डर से भयभीत वह चुपचाप बैठी भगवान को याद करने लगी और मन ही मन निर्णय लिया कि अगले स्टेशन पर डिब्बा बदल लेगी। मल्हौर स्टेशन आते-आते उसने पाया कि उन लडकों के अलावा डिब्बे के लगभग सभी पैसेंजर उतर चूके है। वह भी उतरने को हुर्इ तो देखा कि दो लड़के गेट रोक कर खड़े है। दूसरे गेट पर उसी लड़के को जिसने उसे लताडा था, को देखकर वह और भी घबरा गयी । उसका कलेजा मुंह को आ गया। वह तीसरे डिब्बे की तरफ बढी ही थी कि ट्रेन चल दी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह वहीं खड़ी रही तभी वह लडका उसके पास आया और बोला बैठ जाइएं। वह कुछ नही बोली बस चुपचाप खड़ी रही, वह लड़का उसका हाथ पकड़ कर बोला-बैठो, उसने हाथ छुड़ाते हुए लड़के को डांटने की कोशिश की- देखो ज्यादा बदतमीजी मत करो वरना....... उसका गला भर्रा गया। इतने में वह लड़का उसकी बात काटते हुए गुस्से में बोेला - वरना, वरना क्या कर लोगी, बोलो (बीच-बीच में उसे छुने की कोशिश भी करता) क्या कर लोगी कौन आएगा बचाने हम अपने पर आ गये ना तो किसी को मुंह दिखाने के लायक भी ना बचोगी।
तभी उसने देखा कि बाकी लड़के उसी की तरफ आ रहे है। वह दौड़ कर गेट पर पहुंच गयी। उसने तय कर लिया था कि जरूरत पड़ी तो वह ट्रेन से कूद जाएगी। वह रोते हुए बोली- अगर तुम लोग आगे बढ़े तो कूद जाउंगी। लड़कों को जैसे मजा आ रहा था। वे उसकी तरफ बढ़े तो वह फिर बोली- मैं कूद जाऊगी। तब तक जग्गौर स्टेशन आ गया और वह तेजी से उतर कर दूसरे डिब्बे में आ गयी और फफक-फफक कर रोती रही। मैं भी उसी डिब्बे में बैठा था। मैं उसे छोड़ने उसके घर गया तब जाकर सारी बातें मालूम चली। इस घटना का असर इतना बुरा हुआ कि वह एक हफ्ते तक घर से बाहर नहीं निकली यहां तक कि प्रेक्टिकल इम्तिहान तक छोड़ दिया। ट्रेन से अप-डाउन करने वाले लोग बताते थे कि दो साल पहले एक लड़की ने ऐसी ही किसी वजह से ट्रेन से कूदकर जान दे दी थी | वाकर्इ ऐसी घटनाए अप-डाउन करने वाली लड़कियों की हिम्ममत चूर-चूर कर देती है।


प्रस्तुति-  जय सिंह

       जानकीपुरम, लखनऊ 


मोबाइल न0- 9450437630

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

व्यंग ---------------- मानाने में आगे


जिस तरह औरतें रूठे पिया को मनाती है| रसिक पति अपनी पड़ोसन प्रेमिका को मनाते है| नेता मतदाताओं को, छात्र अपनी गर्लफ्रेण्ड को, और मंत्री आंदोलनकारियों को मनाते है| राज्य स्तर के नेता हाइकमान को मनाते है, प्रथम श्रेणी के कर्मचारी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को मनाता है| अथवा जिस तरह आम आदमी अपनी जीन्दगी की खैर मनाता है| या फिर एक वेतन भोगी कर्मचारी पहली तारीख को भुगतान दिवस और तीन या पांच तारीख को उधार दिवस के रूप में मनाता है। कुछ-कुछ इसी तरह हमारी सरकारें और हम आप भी दिवस, जयंतिया, हफ़ते, महिने, और वर्ष वगैरह मनाते रहते है। हमारे देश में रात के नाम पर दिन, दिन में शबे बारात, नवरात्र और शिवरात्र मनाया जाता हैं | इसके अलावां जो कुछ भी मनाया जाता है वह दिवस के रूप में मनाया जाता है। इनकी एक लम्बी लिस्ट है। वैसे  इन दिवसों को रातों में मनाये जाने की मनाही नही है| चाहे वह महिला दिवस ही क्यों न हो। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर रातों को भी दिन बना देते है। बकौल एक मशहुर शायर “रात का इंतजार कौन करें, आज कल दिन में क्या नहीं होता”। और बकलम कवि जय, “जब दिन इंतजार में बीता, रात को दिन बना लिया हमने”। 
खैर हमारे रग-रग, कण-कण, क्षण-क्षण में यह दिवस का नाम दूध और पानी की तरह घुसा हुआ है। कुष्ठ निवारण दिवस से एड्स दिवस, पर्यावरण दिवस से पोलियो दिवस तक हम मनाने को मजबुर व बेबस है। सच कहूं तो हम सब दिवस मनाने में इतने मशगुल रहा करते है कि कब महिना बीत गया| यह हमें पता ही नही चलता है। मजदूर दिवस, किसान दिवस, महिला दिवस, बाल दिवस, स्वतंत्रता दिवस, जनसंख्या दिवस, शिक्षक दिवस, शहिद दिवस, युवा दिवस, खेल दिवस, हिन्दी दिवस, हमारे कपितय ये महत्वपूर्ण दिवस है| ये सभी दिवस अलग अलग मनाये जाते है| मगर एक दूसरे के पुरक है। हम जानते है कि बिना महिला के बाल, बिना स्वतंत्रता के जनसंख्या, एवं बिना युवा के एड्स| और बिना शहिद होने के भाव के बिना शिक्षक की अहमियत| कुछ कुछ वैसी ही मालूम होती है जैसे बिना हिन्दी दिवस के हिन्दी की। साल भर हर जगह अंग्रेजी भौकनें के बाद हम 365 दिन में एक बार हिन्दी दिवस जरूर मनातें है। इधर के कुछ वर्षो में अपने यहां शहर या देहातों में डेज का चलन भी तेजी से आ गया है, मसलन जैसे फादर्स डे, फ्रेन्डशिप डे, वैलेन्टाइन डे, वाइफ डे, इनर्वसरी डे, और रोज न रोज बर्थ डे तो मनाया ही जाता है। यह सभी डे व दिवस पहले भी थे मगर किसी को कुछ मनाने की सुझी ही नही | लेकिन अब इस आधुनिक माहौल में नर्इ पीढी मनाने के लिए विवश व मजबुर कर दिये है।
जब हमारी मुड या कह लिजिए तबियत इन दिवसों और डेज को मनाते मनाते उब जाया करते है तो हम सप्ताह यानी वीक मनाने की सोचने लगते है तभी मेरा ध्यान कुछ महत्वपूर्ण सप्ताहों की तरफ जाता है। ट्रेफिक पुलिस वाले यातायात सप्ताह, जंगल विभाग वाले वन्य प्राणी सप्ताह, पुलिस लोग शिष्टाचार सप्ताह, बैक वाले लोग ग्राहक सेवा सप्ताह | बचत निदेशालय राष्ट्रीय बचत सप्ताह तथा पी0ए0सी0एल वर्कर प्रमोशन सप्ताह मनाने में जुट जाया करते है। सप्ताह के नाम पर पुलिस और बदमाशो की अच्छी खासी हप्ता वसुली हो जाया करती है। मनाने के नाम पर सब मनमानी होती है। हम पितर पक्ष से लेकर लेकर विपक्ष तक सिर मुड़वाकर पखवारा मनाने की कला में भी हम किसी से पीछे नही रहते है। कहां-कहां हम किसकी-किसकी कितना बखान करें। हम आघोसित तौर पर शौक से बंद दिवस, पर्यटन दिवस, अनशन सप्ताह, आरक्षण पखवारा, लोन पखवारा, लोन पखवारा, आन्दोलन माह, सुरक्षा वर्ष, धान वर्ष, आवास वर्ष, और भ्रष्टाचार वर्ष मनाये चले जा रहे है। घोषित तौर पर हम सब शान से गुंडागर्दी की स्वर्णजयंती, खुनी, डकैती की सिल्वर जयंती और आतंकवाद की रजत जयंती खुशी पूर्वक मना रहे है।



आपका – जय सिंह
 युवा कवि,व्यंगकार,कहानीकार,नाटककार एवं समाजसेवी 

बुधवार, 17 जुलाई 2013

सामाजिक वर्ण व्यवस्था की प्राण हैं- आर्थिक वर्ण व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेकना


        

बड़े-बड़े सामाजिक आंदोलनों का पोस्टमार्टम करने से पता चलता है कि वे भटक इसलिए गये, कि उनके नेतृत्व में इमानदारी थी तो योग्यता नहीं और अगर योग्यता थी तो र्इमानदारी नहीं। भावी समाज का नेतृत्व किसी के हाथ में देते समय एक सावधनी तो यह बरतनी है।
दूसरी सावधनी यह बरतनी है, कि भावी समाज एक ऐसा समाज हो, जिसमें आदमी की योग्यता की एवं उसके कर्म की कद्र होती हो, न कि जन्म की। जन्म के आधार पर भारतीय संस्कृति की वर्ण व्यवस्था बनी है। इसका सैद्धांतिक महिमामण्डल चाहे जितना कर लिया जाये, इसका व्यवहारिक प्रचलन तो भावी समाज के रचायिताओं को कदापि स्वीकार नहीं हो सकता। जन्म के आधर पर कुछ लोगोें को सम्मान और कुछ लोगों को अपमान परोसने वाली इस सामाजिक बुरार्इ ने आरक्षण रूपी जातिवादी बुरार्इ को जन्म दिया। सामाजिक न्याय कायम करने के लिए अनेक प्रयोग चल रहे हैं, लेकिन अब तक के जितने भी प्रयोग सामने आये, उन सबको जब सच्चार्इ में तपाया गया तो इन प्रयोगों की खाक तक नहीं बची। यह देखा गया है कि आरक्षण का खाका अपमान के लिए आरक्षित समुदाय में एक अल्पसंख्यक महाजन वर्ग तो पैदा कर सकता है लेकिन यह दलित समाज के घर-घर में रोशनी का दीप नहीं जला सकता। 

साल भर में जितनी जगहें आरक्षण से भरी जाती है उसकी सौ गुना जनसंख्या हर साल दलित समाज में पैदा हो जाती है। अब तो लगभग सारे दलित शुभचिंतक मानने लगे हैं कि दलित समुदाय में पैदा हो रहा अल्पसंख्यक नवध्नाडय वर्ग दलितों के पूरे समुदाय का भला चाहता ही नहीं। क्योंकि यह नवधनाडय वर्ग यह तो चाहता है कि जन्म के आधर पर बाप का तिरस्कृत व अपमानित जीवन बेटे को उपहार में न दिया जाए। अमीर दलित यह चाहता है कि सामाजिक विरासत और सामाजिक उत्तराधिकार बेटे को देने वाली परम्परा खत्म हो। दलित महाजन सामाजिक दासतां की बेडि़यों को एक क्षण बरदाश्त करने को तैयार नहीें है। वह नहीं चाहता कि बाप को अपमान का आरक्षण झेलना पड़ा तो बेटे को भी झेलना पड़े। वह चाहता है कि आदमी की कीमत उसके कर्मों से हो, न कि जन्म से। वह चाहता है कि यदि अपमानित व्यकित का बेटा योग्य हो, तो उसे वहीं सम्मान दिया जाये जो किसी सम्मानित व्यकित के योग्य बेटे को मिलता है। दलितों के नवध्नाडय लोगों में इस बात को गहरी निष है कि सामाजिक अवसरों की समता सभी के लिए सुलभ हो। मान-आपमान का संबंध् उसके कर्मों से हो। योग्यता के बल पर सम्मान पाने की सामाजिक आजादी सभी को मिले।
'' आर्थिक असामनता जातिगत असमानता से भी गंभीर मुíा है यदि 1950 में संविधन लागू होते समय नेहरु इस सिथति को भांप लिये होते कि भारत में गरीबी का ताना बाना जाति और वर्ग से बुना गया है तो जाति के लांछन के बगैर ही सामाजिक और आर्थिक दृषिट से एक वास्तविक कल्याणकारी राज्य की आधारशिला रख चुके होते तत्कालीन विधि मंत्री डा. बी. आर. अम्बेडकर जिन्हें दलितों का मसीहा माना जाता है। आरक्षण के पक्ष में नही थे, क्योंकि वह इस प्रकार के आरक्षण को बैसाखी मानते थे। बहुत मान-मनुहार के बाद उन्होने कोटा प्रणाली को संविधान में शामिल किया इस प्रावधन के साथ कि सभी प्रकार के आरक्षण एक दशक के भीतर समाप्त हो जाएंगे। किन्तु भारत में  चुनावी राजनीति ने ऐसा रुप धारण कर लिया कि तत्कालीन सत्तारुढ़ दल कांग्रेस को भी जीत के लिए आरक्षण का समर्थन करना जरुरी हो गया। हर दसवें साल सर्वसम्मति से आरक्षण और दस  वर्षों के लिए बढ़ा दिया जाता है । सभी दलों  ने विभिन्न जातियों में अपने-अपने नेता उभार लिए हैं। ये सभी आरक्षण को गाय के समान पावन मानते हैं। चार दशक से भी अधिक समय बीत गया किन्तु अभी तक आरक्षण को किसी ने चुनौती नहीं दी। ये रियायतें अगले 50 वर्षों में भी समाप्त नहीं होगीं। कोटा कायम रखने के लिए निहित स्वार्थ विकसित हो गए हैं।

यदि  वास्तव में दलित महाजनों की निष्ठा वर्णव्यवस्था को मिटाने में होती, तो उनकी निष्ठा कर्म प्रधान समाज की रचना करने में भी होती। तो वे केवल यह नही कहते कि सामाजिक विरासत बेटे को देने वाली परम्परा खत्म हो, वे यह भी कहते, कि आर्थिक विरासत भी बेटे को देने वाली परम्परा खत्म हो। यदि दलित महाजन वास्तव में पूरे दलित समुदाय के शुभचिंतक होते, तो वे केवल यह नहीं कहते कि सामाजिक उत्तराधिकार की परम्परा रोकी जाए, से यह भी कहते कि आर्थिक उत्तराधिकार का कानून खत्म किया जाए। यदि दलित महाजन यह सोचते कि हर एक दलित के घर में न्याय और सम्मान का दीपक जले, तो वे केवल सामाजिक दासता की बेडि़याें पर ही कुल्हाड़ी नहीं चलाते, अपितु आर्थिक दासता की बेडि़यों पर भी कुल्हाड़ी चलाते। तब वे केवल यह नहीं चाहते कि बाप को भले ही आपमान के लिए आरक्षित रहना पड़ा, बेटे को मुक्त किया जाए। वह यह भी चाहता कि बाप भले ही गरीबी के दलदल में छटपटाता रहे तो , बेटे को गरीबी से मुक्त किया जाए।

अगर दलित महाजनो की रुचि दलित उद्धार में होती, तो वह केवल यही नारा नहीं लगाता, कि मान-अपमान कर्म से हो, जन्म से नहीं। वह यह नारा भी लगाता कि अमीरी-गरीबी कर्म से हो, जन्म से नहीं। वह केवल यह तर्क नहीं देता कि सदियों से अपमानित व्यकित का बेटा योग्य हो, तो उसे अपमान के अभिशाप से मुक्त करके वैसा ही सम्मान दिया जाए, जैसा कि किसी सम्मानित बाप के योग्य बेटे को दिया जाता है। वह यह तर्क भी देता कि गरीब बाप का बेटा यदि योग्य हो, तो उसे गरीबी के अभिशाप से मुक्त करके उसे वैसी हो सम्पन्नता से नवाजा जाए जैसी सम्पन्नता किसी अमीर बाप के बेटे के लिए कानूनन आरक्षित होती है। यदि दलित महाजनों में सामाजिक न्याय कायम करने को कोर्इ रूचि होती तो वे केवल सामाजिक अवसरों की समता मांगकर चुप्पी नहीं साध लेते। अपितु वे आर्थिक अवसरों की समता की मांग भी करते। तब वे केवल सामाजिक आजादी में मुकित का मार्ग नही देखते। अपितु आर्थिक आजादी की लड़ार्इ भी लड़ते। यह सब प्रमाण हैं- आरक्षण व्यवस्था के खोखलेपन का, वर्णव्यवस्था के खिलाफ झूठी लड़ार्इ का और सामाजिक न्याय के आन्दोलन के भटक जाने का।

वर्ण व्यवस्था के संकीर्ण रचनाकारों ने कुछ लोगों को जन्म से सम्मान का आरक्षण और कुछ लोगों को अपमान का आरक्षण दिया। इस व्यवस्था को सैद्धांतिक आधार देने के लिए पुर्नजन्म की कल्पना की गर्इ। एक साजिश को समाज में चलाने के लिए दूसरे झूठ का सहारा लिया। इसी पुर्नजन्म के सिद्धांत को लोगों के दिलो-दिमाग में घोट-घोटकर पिलाया गया और अभी तक पिलाया जा रहा है। यह बताया गया कि तुम्हारे पिछले जन्म के कर्म वर्णव्यवस्था के हिसाब से खराब थे, इसलिए तुम अपमानित जगत के परिवार में पैदा हुए हो। अब जीवन भर प्रायशिचत करो। लोगों के जूते अपने सिर पर रखकर ढ़ोओ। लेकिन जिसके जूते ढ़ोओ, उसको स्पर्श मत करना। स्पर्श करोगे तो प्रायशिचत में विघ्न पड़ जाएगा। इस जन्म में भी अधर्म हो गया, तो अगला जन्म फिर इसी जाति में पाओगे। इसलिए बड़ी जातियों के लोगों के दास बनकर जिन्दगी गुजार दोगे तो अगले जन्म में बड़ी जाति में पैदा होने का मौका मिलेगा।
पूर्वजन्म की इस मनगढ़न्त आनुवांशिक भौतिकी ने शूद्रों को अत्याचार सहने लायक बनाया और वे जीवन को ऐसे गुजारने लगे जैसे अदालत से दण्ड पाने के बाद कोर्इ मुजरिम जेल में अपने जीवन के सारे स्वाभिमान को खूंटी पर टांग कर जीने लगता है। कलयुगी अदालत तो 20 साल की कैद को ही आजीवन कैद मानकर संतुष्ट हो जाती है लेकिन कथित सतयुगी अदालत तो दुधमुंहें बच्चे को बचपन से ही कारागार में भेजती रही है।

जरा गौर कीजिए कि जब एक गरीब मजदूर, गरीब रिक्शा वाले, गरीब चपरासी, गरीब अèयापक, गरीब किसान, गरीब घरेलू नौकर के दुधमुंहे बच्चे को बाप का काम ही करने के लिए बाप से ही बाèय करवाया जाता है तो क्या यह वर्णव्यवस्था के अत्याचार से अलग कोर्इ कहानी है? उस दुधमुंहे बच्चे की ओर से अगर तथाकथित इस सतयुगी अदालत में कोर्इ जनहित याचिका दायर करके बच्चे का वकील अदालत से प्रश्न करे कि क्या ठेले वाले का बेटा ठेला चलाने के लायक ही था? क्या रिक्शा वाले का बेटा रिक्शा चलाने के अलावा कोर्इ और काम नहीं कर सकता था? क्या किसान का बेटा सम्पन्नता के लिए आरक्षित अधिकारी नहीं बन सकता था? क्या झाड़ू-पोछा लगाने वाले घरेलू नौकर का बच्चा झाड़ू-पोछा लगाने के लिए ही पैदा हुआ है? क्यों गरीबों के बच्चों को जन्म के आधार पर दण्ड दिया जा रहा है? क्यों जन्म लेते ही गरीबी और अपमान का प्रमाण-पत्र उनके गले में लटका दिया जाता है? आखिर क्यों?
इन सवालों को सुनने के बाद परम्परावादी कथित सतयुगी अदालत अगर 24 कैरेट  शुद्व होगी, तब तो वह सवाल करने वाले को ही फांसी की सजा सुना देगी। कहेगी-तुमने अधर्म किया है, अगले जन्म में तुम शुद्र परिवार में पैदा होेगें और अगर ऊंची जाति में पैदा हो भी गये, तो किसी गरीब परिवार में पैदा होंगे। तुम्हारा जीवन तुरन्त छीना जाता है। अगर अदालत 24 कैरेट से कम पवित्रा हुर्इ तो वकील को फांसी न देकर केवल यह कहकर चुप हो जायेगी कि पिछले जन्म में कर्म खराब थे, इसलिए गरीब के घर में उसका जन्म हुआ है। 

वर्णव्यवस्था ने सम्मान और सम्पन्नता दो चीजें एक तरह के लोगों के लिए आरक्षित है, अपमान एवं विपन्नता दूसरे तरह के लोगों के लिए है। वर्ण व्यवस्था के खात्मे के जो भी आन्दोलन इतिहास में अब तक चलाये गये हैं, उनमें सम्मान-अपमान के आरक्षण का मामला खूब चर्चा में आया। लेकिन अमीरी-गरीबी का आरक्षण भी पुर्नजन्म तथा वर्णव्यवस्था की उपज है, यह बात छिपाकर रखी गर्इ। सामाजिक वर्णव्यवस्था खत्म होनी चाहिए, इसके लिए बड़े आन्दोलन हुए हैं। लेकिन आर्थिक वर्णव्यवस्था भी खत्म होनी चाहिए, इसका जिक्र भी नहीं किया गया, क्यों?

अगर ऊंची जाति के लोग यही सवाल उठा दें, कि यदि दलित आन्दोलन, दलित चिन्तन, दलित साहित्य के रचनाकार अमीरी-गरीबी के आरक्षण को अमीर-गरीब परिवारों से जोड़कर बनाये रखने में श्रृद्धा रखते हैं, तो फिर से सवर्णोें के मान-सम्मान का आरक्षण पूर्ववत बनाये रखने में बुरार्इ क्या है? अगर असवर्ण लोगों को केवल एक अत्याचार करना पसन्द है, तो सवर्ण लोगों को दो अत्याचार करना पसंद है! अगर गरीबों पर अत्याचार करना दलित महाजनों को पसंद है तो दलितों पर अत्याचार करना सवर्णों को पसंद है! अगर गरीब के बेटे को गरीब देखना, दलित महाजनों को अच्छा लगता है तो अछूत के बेटे को अछूत देखना सवणोर्ं को अच्छा लगता है! गरीबों को गाली देकर बात करना यदि दलित महाजनों के लिए आèयातिमक आस्था का विषय है, तो दलित महाजनों को गाली देकर बात करना सवर्णों के लिए आस्था का विषय है! यदि दलित महाजनों की आस्था में किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, तो सवर्णों की आस्था में हस्तक्षेप का अधिकार दलितों को कैसे मिल गया? जो आर्थिक अन्याय की वर्ण व्यवस्था बनाकर रखना चाहता है, वह किस मुंह से सामाजिक न्याय की वर्णव्यवस्था को उखाड़ने की मांग करेगा? यह एक गम्भीर एवं सोचनीय प्रश्न है इस पर गम्भीरता से विचार करना होगा और समाजिक वर्ण व्यवस्था की प्राण, आर्थिक वर्ण व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेकना होगा। 

जय सिंह