बुधवार, 24 अगस्त 2016

दलितों पर दंगल क्यों


यहाँ देश में दलित−दलित का खेल खूब चल रहा है। हर प्रदेश में चौतरफा दलितों पर अत्याचार का रोना−रोया जा रहा है । हकीकत पर पर्दा डालकर हवा में तीर चलाये जा रहे हैं । दलितों का मसीहा बनने की होड़ में कई दल और नेता ताल ठोंक रहे हैं । दलितों को लेकर देश में खूब राजनीति होती है | लेकिन इसके बावजूद इनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं है | अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए 2014 में प्रोफेसर अमिताभ कुंडू ने एक तुलनात्मक रिपोर्ट तैयार की थी | इसमें बताया गया था की आज देश में एक तिहाई दलितों के पास जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने वाली सुविधाएं नहीं है | गावों में 45 फीसदी दलित परिवार भूमिहीन हैं और वह मजदूरी कर जीवन यापन करते है | हालाँकि सरकार ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में दलितों के उत्थान के लिए 38832 करोंड़ रुपये का आवंटन किया है | यह आकड़ा पिछले बजट में 30 हजार था |
सोशल मीडिया पर एकजुटता

आप सभी को जानकारी होगा की पत्रकार रामा लक्ष्मी अपनी रिपोर्ट में कहती है कि दलित युवा अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए सोशल मीडिया जैसे ट्विटर, फेसबुक का भरपूर उपयोग कर रहे है | अभी कुछ माह पूर्व कोलकाता में एक ब्रिज गिरा तो उस हादसे में दर्जनो लोग मारे गए तब कन्ट्रक्सन कम्पनी पर सवाल उठने लगे | इसी बीच एक व्यवसायी मोतीलाल ओसवाल ने अपने ट्विटर पर ट्विट किए कि यह हादसा देश के उन इंजीनियरों के कारण हुआ है जो टैलेंट के दम पर नहीं बल्कि जाति-विशेष और आरक्षण का लाभ लेकर इंजीनियर बनते है | उनके इस ट्विट के बाद सैकड़ो दलितों ने उसके विरोध में ट्विट और फेसबुक पर अपना गुस्सा जाहिर किये | मामला इस कदर बढ़ा कि ओसवाल ने घंटे भर में ही माफी मंगाते हुए अपना ट्विट डिलीट करना पड़ा |
ऐसा ही एक कैम्पेन ट्विटर पर दलितों ने देश की उस कम्पनी के खिलाफ चलाया जिसने अपने एक विज्ञापन में आरक्षण का लाभ लेने से इंकार करने वाले लोवर कास्ट स्टूडेंट को दिखाया था |

इसी तरह बीते मार्च में राजस्थान में जब एक दलित लड़की से दुष्कर्म हुई, दलित महिला सरपंच को गोबर से नहलाया गया, पाली जिले के एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर चढ़ने के कारण उसे बेरहमी से पिटा गया और राष्ट्रीय मीडिया में उसे तवज्जो नहीं मिली, तो दलित युवाओ ने ट्विटर और फेसबुक की मदद से इस घटना की तरफ सबका ध्यान खींचा | गुजरात के उना की घटना तो पूरे देश के दलितों को हिला कर रख दिया | ऐसी क्रूरतम अमानवीय प्रताणना से दलितों में स्वाभिमान भर दिया और अपने ऊपर होते अत्याचार को रोकने के लिए देश ब्यापी आन्दोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा |

         
अभी हल ही में आप सभी को सहारनपुर की घटना झकझोर कर रख दिया है, आप सभी देख ही रहे है की एक जाति विशेष के लोगों द्वारा किस तरह से असहाय और निर्दोष दलितों को किस बेरहमी से मौत के घाट उतारा जा रहा है | जानवरों से भी बत्तर जिंदगी दलितों की हो गई है | इस पर वर्तमान सरकार भी मौन धारण किये हुई है |
 दलित लेखक चंद्रभान प्रसाद कहते है कि अपर कास्ट के लोगो के लिए सोशल मीडिया आविष्कार होगा, लेकिन दलितों के लिए यह क्रांति का बेहतरीन जरिया है |
     देखा जाय तो सदियों से दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है, दलितों को उनका अधिकार देने में अपर कास्ट के लोगों द्वारा दोहरा चरित्र अपनाया जाता रहा है | आज दलितों के पढ़-लिख जाने के बावजूद भी उनके स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं दिखता है | अभी भी दलितों को उनके जनसँख्या के अनुरूप किसी भी क्षेत्र में पूर्ण भागीदारी नहीं मिल पाई है | भले ही सभी दलों के नेता अपने आप को दलितों का मसीहा साबित करने के लिए परेशान है, भले ही उनको दलितों के हितों की बात या अधिकार दिलाने से कोई सरोकार हो या न हो पर दलित हिमायती साबित करने के लिए दिखावा जरुर करते नजर आ रहे है | दिखावा करने के लिए किसी दलित के घर भोजन कर लेने मात्र से दलितों का भला होने वाला नहीं है | नेताओ को अपनी नौटंकी अब बंद करके उनके बेहतर जीवन और रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए |
             महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने लिखा है- डॉ० अंबेडकर ने गांधी को दलितों का दुश्मन नम्बर एक कहा था। उन्होंने गांधी को भारतीय राजनीति में अंतरात्मा की आवाज पर अंधकार युग लाने वाला भी कहा था। यह उन दोनों की लड़ाई थी जो जबरदस्त हुई थीकहें कि खूब बजी थी। इसमें असली कुरुक्षेत्र दलित नेतृत्व को लेकर था । गांधी की इससे बड़ी शतरंजी चाल नहीं थी कि उन्होंने लंदन की गोलमेज सभा में यह दावा करके अंबेडकर के सीने पर कुठाराघात किया कि डॉ. अंबेडकर दलितों के नेता नहीं है ।....... वे अंबेडकर की बजाय खुद को दलितों का असली नेता और प्रतिनिधि घोषित कर रहे थे । उन्होंने सच में डॉ० अंबेडकर को इसकी चुनौती दी थी। कहना यह है कि गांधी इस सच्चाई को छुपा गए जिसे डॉ. अंबेडकर अच्छी तरह जानते थे कि संसार में वे ही कौमें आगे बढ़ती हैं जिनका नेतृत्व उनके अपने हाथों में होता है । सब कुछ छूट जाए, किसी कौम का नेतृत्व उसके हाथों से नहीं छूटना चाहिए- अन्यथा, अगला सारा रास्ता गुलामी और अपमान का होता है । (देखें, दलित चिंतन की स्वतंत्रता, धर्मवीर, नई धारा, फरवरी-मार्च, 2016, पृष्ठ 23 ) आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर सही ही तो कहते हैं, दलित उबाल खा कर लड़ता क्यों नहीं। इसे किस बात का भय है ?

इसी क्रम में प्रसिद्ध आलोचक कैलाश दहिया अपने फेसबुक वाल पे लिखते है कि दलित कौम चिंतन की हारी हुई कौम है । ब्राह्मण ने इसे अपनी व्यवस्था का गुलाम बनाया हुआ है । दलित सोचता है कि कोई दूसरा आ कर इस की गुलामी को खत्म कर देगा । इसीलिए यह कभी बुद्ध की तरफ देखता है तो कभी गांधी की तरफ। बताइए,  किसी को क्या पड़ी है जो वह दूसरे की गुलामी के लिए लड़े ?
अपनी गुलामी मिटाने के लिए खुद लड़ना-मरना पड़ता है । क्या दलित को ईश्वर ने हाथ, पांव, आंख, नाक, कान कम दिए हैं यह अपनी गुलामी के खात्मे के लिए मैदान में क्यों नहीं आता ?
           देखा जाए तो दलितों का सबसे अधिक शोषण राजनीतिज्ञ करते हैं । चुनावों के समय अक्सर राजनेताओं का दलित प्रेम जगता है । लेकिन हकीकत ये है कि ये सियासी लोग दलितों का वोट तो चाहते हैं लेकिन उनकी चिंता नहीं करते । देश के किसी भी कोने से दलितों के ऊपर अत्याचार की कोई घटना प्रकाश में आती है तो सभी दलों के नेता उसे तुरंत हाईजेक कर लेते हैं । चाहे गुजरात हो या बिहार अथवा देश का अन्य कोई हिस्सा, जहां कहीं से भी दलितों पर अत्याचार की खबर आती हैं, नेताओं का वहां पहुंचना शुरू हो जाता हैं। देश का सबसे बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश में आम विधानसभा चुनाव होने वाले है, नेताओं की भी नजरें दलित वोटरों पर लगी रही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगातार ललकार रही हैं कि वह दलितों पर अत्याचार के मुद्दे पर सहानुभूति जताने की जगह दलितों पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें।

नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाइजेशन-इकॉनोमिक डाटा, सेंसस 2011, लोकसभा में पेश रिपोर्ट, एनसीआरबी रिपोर्ट, दलित इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अनुसार --

देश में 1064 जातियां अनुसूचित जातियों (दलित) के तहत आती है
देश में दलितों की आबादी

16.6 प्रतिशत दलित है | यानि करीब 20.1 करोड़ | 2011 जनगणना के अनुसार मुस्लिम 17.22 करोड़ है | वही एसटी 10.4 करोड़ है | यानि मुसलमानों से 3 करोड़ ज्यादा और आदिवासियो से 10 करोड़ अधिक है | 9.79 करोड़ दलित महिलाओ की संख्या है | वहीँ उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 20.5 प्रतिशत दलित है |
दलितों की जिंदगी 
शादी-  दलितों की गैर दलितों में शादी बढ़ रही है, सदियों से चली आ रही परम्पराओं को समाप्त कर अब गैर दलित में शादी करने की शुरुआत कर दी है | 2010 में 7148 गैर दलित ने दलित से शादी की | 2012 में यह आकड़ा 9623 पहुँच गया |

खर्च-  रिपोर्ट में यह सामने आया है की दलितों में खर्च करने की प्रवृत्ति अपर कास्ट से कम होती है | 60 प्रतिशत कम खर्च करते है दलित- 1999-2000 के बीच ग्रामीण इलाके में स्वर्ण परिवारों से दलितों के खर्चे का अंतर 38 प्रतिशत था जो दस साल बाद -2011-12 में 37 हुआ | शहरी इलाको में यह अंतर आज 60 गुना हुआ है |

पढाई-  केवल 4 प्रतिशत दलित ग्रेजुएट है और 45 फीसदी लिखना-पढ़ना ही नहीं जानते | 1999 में 4.6 फीसदी छात्र 12वी से आगे पढाई जारी रख पा रहे थे तो 2011 में यह प्रतिशत 9.4 से आगे नहीं बढ़ पाया |

स्वास्थ्य-  दलितों के 54 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है, 12 प्रतिशत दलित बच्चे पांच साल तक होते-होते मौत के शिकार हो जाते है | 54 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है जबकि मात्र 27 प्रतिशत दलित औरतों को ही बच्चा जनने की सुविधा किसी स्वास्थ्य केंद्र में मिल पाती है |

उच्च पदों में दलित की स्थिति
केंद्र सरकार के उच्च पदों की नौकरियों में नाम मात्र के दलित अधिकारी है | जबकि आरक्षण के अनुसार 15 फीसदी अधिकारी आवश्यक रूप से दलित समुदाय के अधिकारी होने चाहिए |
·        कुल 149 सेक्रेटरी या ऊँचे पदों में कोई दलित नहीं है | यानि 0 प्रतिशत दलित है |
·        108 एडिशनल सेक्रेटरी में से मात्र 2 दलित है | यानि 1.9 प्रतिशत दलित  है |
·        477 जॉइंट सेक्रेटरी में से 31 दलित है | यानि 6.9 प्रतिशत दलित है |
·        590 निदेशक में से 17 दलित है |
·        73 सरकारी विभागों में दलितों के 25037 पद रिक्त है, जिनमे से 5419  पद प्रमोशन नहीं होने की वजह से खाली पड़े है |

दलित उद्धमी की स्थिति
2001 में देश में दलित उधमी 10.5 लाख थे | जो 2006-07 में बढकर 28 लाख हो गए| एक अनुमान के मुताबिक अब इनकी संख्या 87 लाख से अधिक है | वर्तमान में हर साल 30 प्रतिशत दलित उधमी बढ़ रहे है |

     30 दलित करोड़पति बिजनेसमैन है देश में | इसमे 440 करोड़ के मालिकाने के साथ अशोक खाड़े सबसे बड़े और 140 करोड़ की मालकिन कल्पना सरोज सबसे चर्चित दलित व्यवसायी है |

राजनीति में दलितों की स्थिति 
84 सीटें लोकसभा में दलित सांसदों के लिए आरक्षण का प्रावधान है, जिसमे 40 सांसद बीजेपी के है | विधानसभाओ की 4120 सीटों में से 607 सीटें दलित विधायको के लिए आरक्षण है |
          हालांकि, दलित उपर उठ रहे हैं सवर्ण के समांती हुकूमत को दरकिनार करने की पहल भी दिखने लगी है। ऐसे में दलित प्रजा को खोते देख सवर्ण तबका हतप्रभ रह गया है। वैसे, देश भरके आकंडे दलित उत्पीड़न की जो तस्वीर पेश कर रहे हैं वह साफ है। दलितों के बराबरी के मुद्दे को राजनीतिक, ब्राहम्णवाद, सामाजिक बदलाव के दायरे में फंसा कर छोड़ा नहीं जा सकता है। बल्कि राजनीति, समाज, ब्राहम्णवाद यो कहें कि हर वाद को सामने आना होगा और हाशिये के समाज को सिर्फ समाज की संज्ञा से जोड़ना होगा, जहाँ कोई कोई अछूत या कोई अस्पृश्य नहीं हो। वहीं, दलित आंदोलनों के स्वरूप को भी दलितों पर हो रहे उत्पीडन के लिए दोषी माना जा सकता है |

जय सिंह
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, कवि, व्यंगकार 
मोबाइल - 9450437630

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

आरक्षण पर बवाल क्यों ?


० जय सिंह ०

आज चारो तरफ आरक्षण का विरोध सभी प्रमुुख समाचार पत्र की सुर्खियों में हैै। ऐसा लगता है जैसे भारत की रोटीकपड़ामकान,शिक्षास्वास्थ्यमानवीय अधिकार और अपराध जैसी सभी समस्याओ ंका हल हो चुका हैऔर जो समस्याएं बची है उन सभी की जड आरक्षण ही है और आरक्षण खत्म हो गया तो शायद भारत की सभी समस्याएं खत्म हो जायेगी और भारत दुनिया की सबसे बडी महाशक्ति बन जायेगा।
आरक्षण पर चर्चा करने से पहले सामाजिक न्याय के सिद्वान्त को समझना अत्यन्त आवश्यक है। अवकाश प्राप्त जस्टिस के0 सुब्बाराव के अनुसार ‘‘सीमित रूप में सामाजिक न्याय का अधिकार कमजोरोंबृद्वांेनिराश्रितोंनिर्धनोंस्त्रियोंबच्चों, तथा अन्य शोषित और पीडि़त व्यक्तियों के अधिकार के रूप में परिभषित किया जाता हैजो जीवन की निष्ठुर प्रतियोगिता के खिलाफ राज्य के संरक्षण का अधिकार है। यह अधिकारों से वंचित लोगों का सहारा मात्र है ताकि उन्हे जीवन की दोैड़ में उन्नत लोगों के साथ समान अवसर मिल सके। यह अधिकारों की ऐसी पोटली है जो एक ओर तो दूसरे के अधिकारों से तरास कर बनाई गई हैऔर दूसरी ओर यह दूसरे के अधिकारों की रक्षक है। यह सम्पन्न और निर्धनों के बीच एक सन्तुलनकारी चक्र है।‘‘
आरक्षण के सम्बन्ध में बहुत से अनावश्यक प्रश्न समाज के पढे-लिखे लोग करते है। ऐसा लगता है कि मानसिक रूप से बीमार होने के कारण ऐसा आक्रोश खड़ा करते हैजिससे कि बाबा साहेब डा0 भीमराव अम्बेडकर की देन सामाजिक न्याय से बडा दुश्मन उनके लिये कोई है ही नही। हम किसी की मानसिकता या नीयत नही बदल सकते । परन्तु यह बताना चाहते है कि सभ्य देश का सभ्य समाज विचारों से और तर्क से चलता है। विरोधआक्रोशएवं अलोकतात्रिक अपराधिक गतिविधिया सभ्य समाज को दिशा नही दे सकते। हम उन भ्रान्तियों को दूर करना चाहते है।
सबसे पहले सवर्ण समाज के लोग यह समझ ले कि असली आरक्षण वह आरक्षण है जो यह व्यवस्था बनाता है कि मंदिर में ब्राम्हण ही पुजारी होगा। युद्व में क्षत्रिय ही लडेगा। सेना में क्षत्रिय ही भर्ती होगा। शूद्र ही सेवा करेगा। शूद्र के अलोवा कोई सेवा नही करेगा। यह आरक्षण शत प्रतिशत था। मंदिर का पुजारी आज भी ब्राम्हण के अलावा और कोई नहीं हो सकता चाहे वह कितना भी बड़ा संस्कृत भाषा का विद्वान क्यों न हो। ब्राम्हण ही ब्राम्हण का दामाद या ब्राम्हण ही बहू आज भी ब्राम्हण ही हो सकती है।
भारतीय संविधान में आरक्षण संरक्षण की हद तक ही प्रदत्त है। 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग आई00एस0 होंगे तो 85 प्रतिशत तो अन्य के लिये शेष है। भारतीय संस्कृति के आरक्षण में तो आज भी ताला बन्द है। उसे खोलने के लिये कितने आन्दोलन किये गये?  या अपनी मर्जी से वर्ण व्यवस्था को खत्म करने हेतु तथाकथित लाभन्वित पुरोहित समाज ने कोई घोषणा-पत्र तैयार किया ?जिसमें इस आरक्षण को समाप्त करने का निर्णय लिया गया हो या प्रयास किया गया हो। क्या इस सांस्कृतिक आरक्षण में से किसी परीक्षा के आधार पर ब्राम्हण जाति एक भी प्रतिशत हिस्सा किसी अन्य को मेरिट के आधार  पर देने को तैयार है ?
आज के भारतीय संविधान में प्रदत्त संरक्षणों का विरोध करने वाले पहले अपने शत प्रतिशत आरक्षण में से कुछ प्रतिशत छोड़ कर दिखायें तब दलितशोषित और पिछड़े भी मानें कि आपको भारत की चिंता हैभारत के भविष्य के लिये मेरिट की चिंता है। तुम तो शत प्रतिशत आरक्षण लो और दलितशोषित और पिछड़ों के संरक्षण से भी तुम्हे घृणा है। फिर लोकतंत्र में अकेले मेरिट की चिंता करने का अधिकार 15 प्रतिशत लोगों को भी नही है। यह अधिकार तो अन्य शेष 85 प्रतिशत को भी है। देश के ठेकेदार अकेले 15प्रतिशत लोग नही है। देश में हम भी है आप भी है। प्रगति होगी तो साथ-साथदुर्गति होगी तो साथ-साथ। अकेले ही आपको देश की सारी चिंता क्यों है?
आरक्षण ने राष्ट्ªवाद को बढाने का आधार दिया है। समानता स्थापित करने का अभियान छेड़ा है। अंर्तजातीयअंतधार्मिकअंतर राज्यीय विवाहों की संख्या बढ़ी हैजिससे भविष्य में बंधुता और प्रेम बढेगा। जन-जन में हिस्सेदारी का अहसास बढा है। लोकतंत्र मजबुत हुआ है। सामाजिकआर्थिक न्याय की प्रक्रियाराजनैतिक न्याय की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। कमजोरोंअसहायोंपिछड़ोंगरीबोंअल्पविकसित,अनुसूचित जातियोंजन जातियों का कानूनशान्ति व्यवस्था और भारतीय एकता तथा अखण्डता में विश्वास बढ़ा है। आरक्षण कोई भीख नही है जो दलितोंपिछडों को दी जा रही है। आरक्षण कोई आर्शीवाददयाया अहसान भी नही है। यह मात्र सामाजिक समरसता व बराबरी पर लाने का सरकारी साधन है। हर आदमी तक अवसरांे की समानता पहुचें इसे सुनिश्चित करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है।
भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेदों का जिक्र मै करना चाहूंगा। अनु0 15 धर्ममूलवंश जातिलिंगजन्म स्थान या उनमें से किसी के आधार पर विभेद नही करेगा परन्तु अनु0 15 (4) के अनुसार राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछडे़ हुये नागरिकों के किन्ही वर्गो की उन्नति के लिये या अनूसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिये विशेष उपबंध करने का अधिकार होगा।
 सवर्णों की दलील रही है कि आयकर दाताओंअधिकारियोंनेताओं के बच्चों को आरक्षण नही मिलना चाहिए। यह एक षडयन्त्र है। जो आरक्षण प्राप्त करने वाली जातियों के लोगों को आपस में लड़ाने के लिये है ताकि जो नेतृत्व उभर कर आ रहा है वह दलितों और पिछड़ों से अलग हो जाये और उनके बच्चे आपस में लड़ना शुरू कर दे। क्रीमीलेयर कान्सेप्ट आर्थिक स्थिति को लेकर हैजबकि आरक्षण एक सामाजिक समस्या ‘‘जातिवाद‘‘ का हल है। भारत के दलित राष्ट्रपति का बेटा भी उतने ही अछूत है जितने कि साधारण सफाई कर्मचारी के बच्चे। दोनो जब अपने गांव जायेगे तो उनकी पहचान बिरादरी के नाम से ही होती हैन कि उनके या उनके मांॅ-बाप के पद से। उसके अलावा जब नौकरी में आने के बाद लोग सोचेगे कि अब हम और हमारे बच्चे समाज से अलग हो गये है तो आरक्षण का दर्शन ही ध्वस्त हो जायेगा। आरक्षण के दर्शन का मतलब है कि आरक्षण के कारण किसी पद पर बैठने वाला व्यक्ति अपने लोगों को शक्ति और सत्ता के गलियारे में हिस्सेदारी का अहसास दिलाये। आरक्षण जातिवाद को खत्म करने के लिये दिया गया है। जातिवाद एक सामाजिक समस्या है। ठीक वैसे ही जैसे कि दांत का इलाज आंख का डाक्टर ठीक से नही कर सकता। आर्थिक आधार पर आरक्षण सामाजिक समस्या को हल नहीं कर सकता।
आरक्षण विरोधी आरक्षण के विरोध में धरना-प्रदर्शनदंगा-फसाद और संविधान संशोधन की बात रहे हैआत्महत्या कर रहे है। दलित और पिछडे वर्ग के लोगों ने इस बात को लेकर कभी आत्म हत्या नहीं की कि उनकी आज भी सेना में संख्या कम है। आज भी न्यायालयों मे संख्या कम है। आज भी विश्वविघालयों में शिक्षकों के पद पर उनकी संख्या नगण्य है। आज भी उनको मंदिरों में प्रवेश नही करने दिया जाता है। आज भी उनके साथ जातिगत भेदभाव किया जाता है। उनका आदमी बद्रीनाथ हो या द्वारका वहां का पुजारी नियुक्त नही किया जा सकता। सवर्णो की हिम्मत सिर्फ इतने में टूट गई कि कुछ लोगों को उनकी कक्षा में बैठने को मौका मिल रहा है। या जिसके साथ आज तक अन्याय होता रहा अब उसके कम होने की उम्मीद है या समाप्त हो रहा है। वैसे मैं जानता हूुं जब-जब सवर्ण संघर्ष से घबराते है वे ऐसा ही करते है। उन्होने सती जौहर आदि जैसे सिद्वान्त अपनी संस्कृति में पहले से ही डाल रखे है।
आरक्षण विरोधियों से अपील-
आरक्षण के विरोधियों ! अपनी संस्कृति का अध्ययन करो और उस संस्कृति के आड़ में दलितोंपिछड़ों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार को खत्म करो। आरक्षण नही जातिवाद खत्म करो। हड़ताल करने वालेजाति-धर्म पर राजनीति करने वालेदंगा-फसाद कराने वाले लोगों एक-एक महिने की कमाई जमा करके 1 महिने में देश में 20 गुना  व्यवसायिक शिक्षण केन्द्र खोलो। अपने नामगली मोहल्लोंसंस्थाओं से जाति सूचक नामउपनाम हटाओ और इसके लिये कानून बनाने की मांग करो। सरकारी और निजी क्षेत्रों में महिलाओं के 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग करो। अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति अन्य पिछडे वर्गो और अल्पसंख्यकों के बैकलाग भरने के लिये संघर्ष करो।
अन्र्तजातीयअन्तधार्मिक विवाहों को पुरस्कृत करो एवं प्रोत्साहित करो। निजी एवं सरकारी आवासीय कालोनियों और बाजारों में आरक्षण पूरा करो। दलितोंपिछडोंअल्पसंख्यकों का आरक्षण साम्प्रदायिकता कम करेगा। सरकार से मांग करो कि अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति व अन्य पिछडे वर्ग के लोगोंमहिलाओं और अल्पसंख्यको को सेना और सभी न्यायालयों में आरक्षण दिया जाये। छुआछुत मानने वालों का सामाजिक वहिष्कार करो। दहेज उत्पीड़न करने वालों का समाजिक वहिष्कार करो। ताकि आरक्षण की आवश्यकता ही न रहे। अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछडा वर्ग में अभी से क्रीमीलेयर ढूढ़ने वाले सवर्णाें की क्रीमीलेयर तय करें और उन्हे सरकारी सुविधाओंलाभोंसामाजिक सम्मानआर्थिक लाभधार्मिक पदोंपूजा ग्रहों के पदों से वंचित करने के लिए कानुन बनाने की मांग करें। जब सभी जगह बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित हो जायेगा तो मेरा मानना है कि आरक्षण की आवश्यकता किसी को नही होगा और न ही कोई किसी का विरोध करेगा।
लेखक-  जय सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
मोबाईल-9450437630

सोमवार, 10 अगस्त 2015

खबरों के बाज़ार में पत्रकारों की भूमिका....



आज हम पत्रकारिता के भविष्य और दशा के सम्बन्ध में बात करना चाहता हू कि पत्रकारिता और पत्रकार की कैसी भूमिका रही है और वर्तमान में है।
पहले दौर की भारतीय पत्रकारिता और मौजूदा पत्रकारिता में एक बहुत बड़ा फर्क संप्रेषण को लेकर है। विगत के दशकों में ब्राडकासिटंग बहुत मुश्किल थी और सेटेलाइट नही थे। इसलिए आज भरतीय मीडिया में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इस कारण से मीडिया का विस्तृत रूप हो गया है। पहले तो सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था। आज सैकड़ो टीवी चैनल्स एवं प्रिंट मीडिया हो गये है। सोशल  मीडिया की भी बड़ी भूमिका हो गर्इ है।
पहले के दौर की पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता सिटंग आपरेशन बहुत कम थे लेकिन अब इसका विस्तार हो गया है। साथ ही नकारात्मक पहलू यह है कि कारपोरेटाइजेशन के चलते मीडिया की विश्वसनीयता में गिरावट आ गर्इ है। जब-जब कार्पोरेटाइजेशन होता है तो सिथति गंभीर होती है। कुछ समय पहले अखबार एडिटर के कब्जे में हुआ करता था लेकिन आज विज्ञापन या शर्कुलेसन मैनेजर के कब्जे में है। इसलिए जो खबरें आज प्रकाशित हो रही है या दिखार्इ जा रही है वो विज्ञापन या प्रवन्ध की सोच के हिसाब से होती है। पाठकों का हित कही पीछे चला गया है। सिद्धान्त एवं मूल्य का हास हो रहा है। न्यूज का दायरा सीमित होता जा रहा है जबकि मनोरंजन पृष्ठ बठता जा रहा है। न्यूज अगर मनोरंजक है तो प्रकाशित हो जाती है, जबकि सूचना प्रधान खबरों का प्रकाशन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
संपादक की भूमिका भी कमजोर होती दिखती है------
आज 400 से ज्यादा न्यूज चैनल है। ये अलग बात है कि ज्यादातर चैनल जो कुछ दिखाते है, उनका खबर से कोर्इ सरोकार नही है। नाग-नागिन का नाच, भूत-प्रेत, बाबाओं का प्रवचन, या किसी अभिनेता का सिरदर्द भी ब्रेंकिग न्यूज हो जाता है। बड़ी बात यह है कि ज्यादा चैनल होने के बाद भी उनकी गुणवत्ता में सुधार नही हुआ है।
अखबारों की बात करें तो 90 हजार से ज्यादा समाचार पत्र आर एन आर्इ में पंजीकृत है। इनमें से कुछ अखबारों का सकर्ुलेषन बहुत ज्यादा है। कर्इ अखबारों पर बाजार का दबाव है, एक तरह की मोनापोली भी है। पीछले कुछ वर्षो से बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के मालिक मीडिया समूहों के मालिक बन गए है। अंबानी, विडला जैसे पूंजीपतियों ने मीडिया कम्पनी खरीद ली है। यह बदलाव लोक माध्यम के लिए अच्छा नही है। यह नागरिकों की अभिव्यकित की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के लिए शुभ संकेत नही है।
पत्रकार की भूमिका--
पत्रकार को किसी नियम से नही बांधा जा सकता है परन्तु नैतिक मूल्यों, मानवीय उददेष्यों, जन-कल्याण, दूरदृषिटता, रचनात्मक दृषिटकोण व लोकतंत्र से बंधे हुए है। ये बंधन हम सबको मर्जी से स्वीकार कर लेने चाहिए। पत्रकार के सामने मात्र तथ्यों को प्रस्तुत करना ही नही है बलिक उसे समाज का मित्र, दार्शनिक, और मार्गदाता का कार्य करना है। हर उस तथ्य पर उंगली उठानी है जो समाज की दशा को विकृत कर रहा है, उस घटना को जगह देनी है जो समाज की दिशा  को दिग्भ्रमित कर रही है। उसका महत्व शक्ति  संचय से नहीं कमजोरों में शक्ति  संचार से बढ़ेगा।
अफवाह चर्चा से सावधानी एवं बहुत दूरी बरतना बहुत आवष्यक है। पत्रकार की ताकत इस बात में निहित है कि वह नर्इ सभ्यता का नया किसान बन कर उभरा है जो वह परोसता है समाज उसे ही ग्रहण करता हैै। आज आम आदमी की जुबान पर जो बड़े-बड़े घोटालों के नाम है वे मीडिया की वजह से ही उजागर हुए है। जिन घोटालों या भ्रष्टाचार की शिकायत आज आम आदमी करता है, उसके पीछे पत्रकारों का बड़ा रोल है। लेकिन यह भी सच है कि मौजूदा मीडिया की चौथे पायदान की भूमिका में कमी आर्इ है, उसमें सूधार होना चाहिए। भारत ही नहीं दुनिया भर में मीडिया आज अहम किरदार है। इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस देश में भी तानाशाही होती है, वहां की सरकार सबसे पहले प्रेस को बंद करती है। किसी भी लोकतंत्र को बचाए रखने के स्वतंत्र व मजबुत प्रेस होना बहुत जरूरी है।
आज का समाज घटना की छुपी हुर्इ सच्चार्इ को खोलकर सार्वजनिक करने की उम्मीद पत्रकारों से ही करता है। इस कठिन दौर में भी यदि पत्रकारिता की विष्वसनीयता बढ़ी है तो उसके पीछे लोगों का उनमें पनपता विष्वास है। किसान तक भी आस-पास की घटी घटनाओं को गांव का कम पढ़ा लिखा मजदूर भी मीडिया में पढ़ने के बाद ही प्रामाणिक मानता है।
कहते है कि एक सजग पत्रकार की निगाहें समाज पर होती है तो पूरे समाज की निगाहें पत्रकार पर होती है। पर दुर्र्भाग्यवश अब पत्रकारिता का स्वरूप एवं परिभाषा बदल गया है। संपादक खबरों की बजाय विज्ञापन एवं पेड न्यूज पर ज्यादा जोर दे रहे है। हम उन पत्रकारों को भी नही भुल सकते जिन्होनें यातानाएं सहने के बाद भी सच का दामन नही छोड़ा और देश की आजादी में अपना सर्बस्व न्योछावर कर दिये। ऐसे में जरूरत है कि पत्रकारिता को समाज की उम्मीद पर खरा उतरते हुए अपनी विष्वनियता को बरकार रखना होगा। पत्रकारिता सत्य, लोकहित में तथा न्यायसंगत होनी चाहिए।

जय सिंह 

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

My love life is not a Game of Monopoly

Why is it we have to play games in relationships.  Why does my love life resemble jenga more than the notebook? I recently got into the longest, lamest nothing fight in history with my guy. Instead of being adults, we are at a stalemate. Because that’s how it works now a days. Let’s see who is going to crack first. Who is going to send the first text or ask to hang out or want to talk? Who is going to apologize? I say who goddamn cares?
I don’t want to “win” or be right. I don’t even know what winning in this situation would be anymore. I just want to be able to eat pizza and watch Adventure Time with the man I love. So what the crap?. I am too old to be playing games, most of us are, but we still do it. We don’t want to reach out and seem needy or clingy. We don’t want to be rejected or hurt. Well we are all a giant bunch of vaginas and need to grow a pair. No one ever got anywhere by doing nothing.

Worst case scenario, you get completely ignored. Perhaps the other person moved to Africa and has mo wifi ( it could happen). May be the had a chemical accident at work and cant see your text or hear your call and they don’t have a brail phone yet. Or they clearly died. Which is sad, but you would have never  known if you didn’t reach out and those new black pumps needed a good funeral to go to.
What if they do answer, but the argument continues? I say go ham. If this stupid fight won’t die, them it’s time to hash it out. However, fight nice. No name calling, no blame, no crazy bullshit. Just the facts, ma’am. My best advice, when something your other half does is upsetting or hurtful, always use “I” statements. “I feel upset when you call me a cunt.” Just a loose example, but it takes away the attack and lets them be less defensive. And if none of that works, punch them in the face and be done with that crazy dbag.
Or the outcome that for some reason we never expect could happen. They could actually want to make up and move on. It would be shocking I know, but try not to pee yourself. In that case just let it go if you can, talk out anything you need to, and make sure there is lots of hugging (or sex, sex is good.)

Unfortunately for me, my situation may have been the final straw for something that was not quite meant to make it even this far. Only time will tell, but I hope better luck upon the rest of you. Always remember, you are worth more than you think. Never let anyone else dictate that.


Jai Singh


शुक्रवार, 9 मई 2014

यूँ बात-बात पर रूठा न करो .............


प्यार है तो तकरार भी होगी, जरुरत बस इतनी है की दिलबर की बातों को न ले दिल पर ......


अक्सर ऐसा होता है कि एक दूसरे को अच्छी तरह समझने का दावा करने और अत्यधिक प्रेम करने वाले प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी में भी छोटी- छोटी बातों पर तकरार हो जाती है | वे एक दूसरे से रूठ जाते है और उनके बीच अबोला चलने लगता है |
झगड़े के मसालों को यों ही बातचीत किए बिना या सुलझाये बिना छोड़ देना आपके रिश्ते के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है | हर बार पार्टनर के एक ही रवैये को लेकर मन में गुस्सा इकठ्ठा करना समस्या को और बाधा देता है | एक दूसरे पर दोषारोपण करने गलतियों को गिनाने और एक दूसरे की बात को नकारने से बेहतर होगा कि आप सार्थक बातचीत से आपसी विसंगतियों को दूर करने की कोशिश करें | आपसी समझदारी से काम लेकर आप अपने रिश्ते को मधुर बनाने का प्रयास करें |

क्यों होती है तकरार ?

v  एक दूसरे की बात ध्यान से न सुनना |
v  किसी एक का आलसी होना या हमेशा देरी से पहुचना |
v  दोस्तों की अत्यधिक तारीफ करना |
v  एक दूसरे को उपहार न देना |
v  जाने – अनजाने में कोई गलती हो जाने पर उसे स्वीकार न करने पर 
v  जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ जैसी महत्वपूर्ण तारीखें भूल जाना |
v  आर्थिक स्तर को लेकर भी वैवाहिक जोड़ो में बहस हो जाती है |
v  एक दूसरे को फोन न करना और फोन पर हाल चाल हमेशा न लेना |
v  किसी से फोन पर बात चीत करते समय एक दूसरे का फोन आने पर व्यस्त टोन होने पर तरह तरह के सवाल करने पर |
v  किसी एक का गलत संगत या गलत आदतों की गिरफ्त में आ जाने के कारण |
v  घरेलु कामों को लेकर भी अकसर पति पत्नी के बीच विवाद का मुद्दा बन जाता है |
v  किसी पुराने अफेयर या मित्रता का बारे में पता चलने पर |
v  एक दूसरे के मन में शक या अविश्वास पैदा हो जाने के कारण भी विवाद की स्तिथि पैदा हो जाती है |
v  एक दूसरे से अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए बात करने पर |
v  किसे दूसरे से एक दूसरे की तुलना करने और उसे बेहतर बनाने पर |

कैसे करे तकरार का समाधान


v  अपनी समस्याओं से एक दूसरे को अवगत कराएँ |
v  अपने साथी को समस्याओ को समझने का पूरा मौका दें |
v  बात को समझने के लिए स्वंय को अपने पार्टनर की जगह रखकर देखें |
v  पार्टनर की बातो को ध्यान से सुने |
v  जाने – अनजाने में कोई गलती हो जाने पर उसे स्वीकार करना सीख ले और दुबारा गलती न करने का भरोसा दिलाए |
v  एक बार में एक ही समस्या के बारे में बताएं | लड़ाई सुलझाते समय पिछली सारी गलतियों को गिनाना प्रारंभ न करें | इससे समस्या सुलझने के बजाय उलझ जाती है |
v  तकरार का समाधान करते समय अपना आपा न खोएं | शांति बनायें रखें | उचित शब्दों में अपनी बात कहें | इस दौरान सामने वाले को दुःख पहुँचाने की मंशा कदापि नहीं होनी चाहिए |
v  अगर आपको लगता है कि बातचीत के दौरान तनाव और गलतफहमी बढ़ रही है तो बात चीत वही ख़त्म करके अपना पक्ष किसी और तरीके से अपने पार्टनर तक पहुंचाए | जैसे लिखकर, ई मेल द्वारा या अपने किसी खास दोस्त की मदद से |
v  जब भी एक पक्ष को झगड़े में अधिक क्रोध आ रहा हो तो स्पर्श का जादू चलायें | अपने साथी के कंधे पर या हाथ आश्वासन तथा स्नेह भरा स्पर्श दें | तकरार के दौरान गुस्से को शांत करने का यह बेहतरीन तरीका है |
v  जब आपस में झगडा होने लगे तो एक पक्ष को एकदम शांत हो जाना चाहिए | दूसरा अपने आप चुप हो जायेगा | एक दूसरे की प्रतिक्रिया करने से विवाद बढ़ता जायेगा |

प्रस्तुति--- 

----------  जय सिंह ..............


युवा कवि, ब्यंग्कार, कहानीकार 

सोमवार, 5 मई 2014

कहानी------ कठिन डगर



किसी ने ठीक ही कहा है सफर यात्रा शब्द का वास्तविक अभिप्राय अंग्रेजी भाषा के सफर शब्द में छिपा है। मै लम्बे समय तक इसकी भुक्तभोगी रही हूं। एक दो नहीं पूरे तीन साल हमने इस सफर के मजे लिए है। उन दिनों हम बाराबंकी में रहते थे और पढने के लिए लखनऊ आया जाया करते थे। हमारी भाषा में इसे अप-डाउन कहा जाता है। जब लखनऊ विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया तब सोचा था कि मुश्किल से एक घण्टे का सफर है यूं ही निकल जाएगा। लेकिन यकिन मानिये इस एक घण्टे का एक-एक पल बेहद भारी होता है। मेरी हमसफर एक सहेली भी थी। शुरू-शुरू में हम दोनों फैजाबाद पैसेन्जर से अप डाउन किया करते थे। इसके लिए हम आठ बजे सुबह घर छोडते तो शाम को सात बजे वापस लौटते। सहेली जरा कमजोर दिल की थी| दो दिन में हाथ खडे कर दिये। कहने लगी लौटने में रात हो जाती है। अभी ये हाल है तो जाडे में क्या होगा उस पर सात घण्टे आने-जाने में ही लग जाते है। मैने खूब मान मनौवल की दोस्ती का हवाला दिया। वरना वह तो कालेज छोडने का पूरा मन बना चुकी थी। दूसरे दिन हमें स्टेशन पहुंचने में थोडी देर हो गयी और फैजाबाद पैसेन्जर सामने से निकल गयी। अब क्या करें। सोचा दूसरी ट्रेन से चलते है। 8 बजकर 40 मिनट पर गोण्डा पैसेन्जर आयी। जिस डिब्बे में हम घुसे उसी में लडकों का जत्था घुस गया। ट्रेन में पैसेन्जर कम थे। वे लड़के हमारे सामने की सीटों पर बैठ गए। फिर कर्इ जोडी आंखे हम पर टिक गयीं। वे सिर से पांव तक इस तरह हमारा मुआयना कर रहे थे कि मानों पढने के लिए अप-डाउन का फैसला करके कोर्इ जुर्म किया हो। हम नजरें नीची किये बैठे रहे। तभी उनमें से एक बोला-अबे नीचे क्यों देख रहा है। दूसरा बोला- ताकि कोर्इ सैंडिल न चुरा लेकर जाए फिर पहले वाला लडका बोला- लेकिन सैंडिल है अच्छी। (मन मे आया कि कह दूं कि तेरे सिर पर पडेगी तो और अच्छी लगेगी लेकिन चुप ही रहने में बेहतरी समझी) तभी दूसरा बोला- अबे पैर क्यों हिल रहे है। (दरअसल मेरे पैर हिलाने की आदत ने उन्हे एक और मुददा दे दिया)
पहला बोला- ट्रेन क्यों हिल रही है।
दूसरा बोला- नही बे। लगता है पोलियो हो गया है। इतना कहना था कि मेरे पैर अपने आप ही हिलना भूल गये।
दूसरा फिर बोला- देख ठीक हो गया। और ट्रेन के डिब्बे में एक जोर का ठहाका गूंज उठा। मेरे आंखो से आंसू निकलते निकलते रह गये।) तभी मेरी सहेली अपने सरकते हुए दुपटटे को संभालने लगी। तुम-ओढो मेरी जान दुपटटा संभाल के  ़ ़़ ़ ़ ़। यह कोरस गीत तालियों के साथ उस डिब्बे को गुलजार करने लगा। हम बस तिलमिलाकर रह गये। कर भी क्या सकते थे हम दो और वे आठ-दस। उनकी घूरती नजराें से बचने के लिए हम अपनी किताबें निकालकर पढने लगे तभी उनमें से एक बोला-अरे इतना मत पढो वरना टाप कर जाओगी। बादशाह नगर स्टेशन तक यह सिलसिला चलता रहा और हम उन लडकों के लिए मजाक का विषय बनकर हर पल अपमान का घूंट पीते रहे।

वैसे बाद में मैने यह महसूस किया कि ट्रेन से अप-डाउन करने वाली लडकियों को किताबाें से प्यार हो ही जाता है। यह बात और है कि उसका इस्तेमाल वे पढने के लिए नहीं बल्कि मनचले लड़कों की घूरती नजरों से बचने के लिए करती है।
उस दिन कालेज पहुचते-पहुचते सवा बारह बज गये। पहला लेक्चर खत्म हो चुका था, दूसरा शुरू हो चुका था। सोचा पीछे से क्लास में घुस जाएंगेे लेकिन टीचर ने देख लिया और बाहर खडा कर दिया। उसी दिन हमें पता चला कि 3:40 बजे छोटी लाइन से बरौनी एक्सप्रेस जाती है। हमें छोटी लाइन पता ही न थी हमें तो सिर्फ एक ही लाइन पता थी यह कि साढे पांच बजे फैजाबाद पैसेन्जर मिलेगी। रिक्शे वाले से पूछा तो कहने लगा- पंद्रह रूपये पडेगेे। क्या करते पांच के बजाय पंद्रह रूपये देकर भागते-भागते स्टेशन पहुंचे तो नामुराद टी०टी० ने रोक लिया कि एमएसटी दिखाओ। बरौनी एक्सप्रेस का प्लेटफार्म नम्बर पता करके जब तक हम पहुचे तब तक ट्रेन चल चूकी थी गार्ड हरी झण्डी दिखा चुका था। ट्रेन जा रही थी हम उदास मन से उसे विदा दे रहे थे। आंखों के सामने से ट्रेन निकल जाने का दर्द उस दिन के बाद भी कर्इ बार सहना पडा।
 कभी टीचर ने पांच मिनट ज्यादा पढा दिया तो कभी रिक्शा मिलने में थोडी सी देर हो गयी। आंखो के सामने से जब ट्रेन निकल जाती है तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी दस दिन के भूखे के सामने से निवाला छीन लिया गया हो और जो कभी दौडकर पकड़ लिया तो लगता है किला फतह कर लिया। पर उस दिन तो स्थितिया हमारे पक्ष में न थी । पूछताछ केन्द्र से पता चला कि सवा चार बजे गोण्डा पैसेन्जर जाएगी। गोण्डा पैसेन्जर से आने का मजा हम सुबह ही उठा चुके थे। 8:40 बजे बाराबंकी से चले तो 11:50 बजे लखनऊ पहुचे थे। लेकिन क्या कहें बुरा वक्त आता है तो सब बुरा ही होता है। बालमन ने दृढ़ता दिखायी। जल्दी घर पहुचने की चाहत ने जोर मारा। कहां सवा चार कहां साढे पांच बजे बस फिर क्या था सुबह का सफर भुलाकर हम लोग बैठ और साथ ही हमारा दुर्भाग्य भी। मल्हौर रेलवे स्टेशन पर जो ट्रेन रूकी तो फिर चलने का नाम ही नहीं ले रही थी। साढेे पाच से छ: फिर साढे सात बज गये। अंधेरा हो गया किसी को कुछ पता नही कब चलेगी। एक तो उस ट्रेन में वैसे भी कम लोग होते है और उस पर लडकों का झुण्ड। विचित्र प्रणियों का सफर तो तफरीबाजी में ही कटता पर किया भी क्या जा सकता था। जैसा कि मैं पहले ही कह चूकी हूं कि हमारी सहेली जरा कमजोर दिल की थी। लगी बुक्का फाड के रोने। मैने लाख समझाया चुप रहो। पर वो कहा मानने वाली थी । 
डिब्बे में हमदर्दी का तांता लग गया। मैंनें कहा- भगवान के लिए तमाशा मत बनाओ उसका सुबकना फिर भी बन्द नही हुआ। बगल से एक दो नहीं मालगाडी मिलाकर कुल सात गाडियां गुजरी। तभी एक एक्सप्रेस ट्रेन दुसरी पटरी पर रूकी। सबने कहा वो एक्सप्रेस है तो पहले ही जायेगी। हम दोनों भी पैसेन्जर छोड़ एक्सप्रेस पर जा बैठे पर उसने भी साथ न दिया और पैसेन्जर चली गयी। अब तो मेरा भी धैर्य जबाब दे गया। आंखो से आंसूू छलक पड़े। कुल मिलाकर रात नौ बजे हम बाराबंकी स्टेशन पहुचे। हमारे चाचा जी और हमारी सहेली के पापा जी स्टेशन पर हमारा इंतजार कर रहे थे। दूसरे दिन वो मनहुस खबर सुनने को मिल ही गयी जिसके न मिलने की हम दुआ कर रहे थे। हमारी सहेली ने ठान लिया कि अब पढार्इ छोड देगी और अगले साल बाराबंकी से बीए करेगी। अब बची मै हर रोज लडको के कमेन्ट सहने के लिये और वेसे इनसे बचने के लिए मैने एक रास्ता निकाला। बैठने से पहले मै ट्रेन में महिलाओं की तलाश करती और उसी वर्थ पर बैठती जिस पर कोर्इ आण्टी जी बैठी होती।
अप-डाउन के दौरान ट्रेन के सफर से जुड़ी एक रोचक घटना तब हुर्इ जब मै और दो सहेलियां गोरखनाथ एक्सप्रेस में बैठ गये। पिता जी ने बताया था कि लखनऊ से गुजरने वाली सारी ट्रेन बाराबंकी स्टेशन पर रूकती है। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि हमारे पिता जी का रेलगाडी ज्ञान जरा कम थाक्योंकि वास्तव में गोरखनाथ एक्सप्रेस सीधे गोण्डा जाकर रूकती है।  जब हमें यह बात पता चली तो हमारे हाथ-पांव फुल गये। करीब साढे़ पांच बजे गोरखनाथ एक्सप्रेस बाराबंकी स्टेशन पार कर गयी। हम गेट पर खड़े के खड़े रह गये। मन में अजीब -अजीब खयाल आ रहे थे ढार्इ घण्टे में गोंडा पहुचेंगे वहां से पैसेन्जर ट्रेन पकड़कर वापस बाराबंकी आना रात के ग्यारह बारह बज जाएंगे टिकट भी नहीं है कहीं टी टी ने पकड़ लिया तो। यह सब सोचकर दिल बैठा जा रहा था। तभी जहांगीराबाद स्टेशन पर ट्रेन रूक गयी वैशाली एक्सप्रेस की क्रासिंग थी। मै ट्रेन से कूद पड़ी। इत्तेफाक से दो शख्स और भी ऐसे थे जिन्हें बाराबंकी उतरना था। जहांगीरा बाद स्टेशन मतलब एक बरगद का पेड़। हमने एक व्यक्ति से पूछा भार्इ साहब यहां रिक्शा कहां मिलेगा।
जवाब मिला- कहीं नहीं।
मैनेे कहा- बाराबंकी जाना है।
जबाब मिला- ढार्इ घण्टे इन्तजार करो पैसेन्जर ट्रेन आएगीचले जाना।
मैं फिर जोड़-घटाने में उलझ गयी छ: बज रहे है ढ़ार्इ घण्टे मतलब साढ़े आठ, फिर आधा घण्टा बाराबंकी पहुंचने में।
मैने फिर पूछा- भार्इ साहब टैम्पो तो चलती है।
जवाब मिला- हां यहां से चार-पांच किलोमीटर पैदल जाइए तो चौराहे पर टैम्पो मिल जाएगी।
उन दोनो अंकलों के साथ हम तीनाें उस सुनसान रास्ते पर निकल पड़े। दोनों तरफ जंगली झाड़ उसके आगे खेत बीच में संकरी सी पगडण्डी खैर करीब पौन घण्टा पैदल चलने के बाद हम चौराहे पर पहुंचे तो टैम्पो निकल गयी। दूसरे टैम्पो वाले से पूछा कि तुम कब चलोंगे तो बोला- सवारी मिलेगीं तो जाएगें वरना नहीं जाएगे। फिर दोनो में से एक अंकल जिनके पास सामान ज्यादा था, वे जम्मू से आ रहे थे और आर्मी पर्सन थे, ने टैम्पो रिजर्व की तब जाकर हम घर पहुंचे।

छेड़छाड़ की मामूली सी दिखने वाली घटनाएं कभी-कभी  भयानक रूप ले लेती है। ऐसा ही एक वाकया महिला कालेज में पढ़ने वाली एक लड़की के साथ हुआ। ट्रेन से आते-जाते कर्इ बार हमारी मुलाकात हुर्इ थी जिससे हमारे बीच अच्छी जान-पहचान भी हो गयी थी। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। हुआ यूँ कि एक लड़के की छीेटाकशी के जवाब में उसने दस लडके को जमकर लताड़ा। भीड़ के दूसरे सदस्यों ने भी उसका साथ दिया और उस लड़के को एक दो झापड़ भी रसीद कर दिया। तब से वह लड़का हर समय उसे सबक सिखाने की फिराक में रहता। बात इतनी बढ़ गयी कि लड़की कुछ दिनाें तक बस से अप-डाउन करने लगी। इत्तेफाक से उस दिन बसों की हड़ताल थी और उसके प्रेक्टिकल इमितहान थे। उसने एक बार फिर ट्रेन का सहारा लिया। बदकिस्मती से लौटते वक्त मेमू ट्रेन के जिस डिब्बे में वह चढ़ी उसमे भीड़ कम थी। कुछ देर बाद चार लड़के हाथों में सुलगी सिगरेट लिए उसके सामने वाली सीट पर बैठ गये। किसी अनहोनी के डर से भयभीत वह चुपचाप बैठी भगवान को याद करने लगी और मन ही मन निर्णय लिया कि अगले स्टेशन पर डिब्बा बदल लेगी। मल्हौर स्टेशन आते-आते उसने पाया कि उन लडकों के अलावा डिब्बे के लगभग सभी पैसेंजर उतर चूके है। वह भी उतरने को हुर्इ तो देखा कि दो लड़के गेट रोक कर खड़े है। दूसरे गेट पर उसी लड़के को जिसने उसे लताडा था, को देखकर वह और भी घबरा गयी । उसका कलेजा मुंह को आ गया। वह तीसरे डिब्बे की तरफ बढी ही थी कि ट्रेन चल दी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह वहीं खड़ी रही तभी वह लडका उसके पास आया और बोला बैठ जाइएं। वह कुछ नही बोली बस चुपचाप खड़ी रही, वह लड़का उसका हाथ पकड़ कर बोला-बैठो, उसने हाथ छुड़ाते हुए लड़के को डांटने की कोशिश की- देखो ज्यादा बदतमीजी मत करो वरना....... उसका गला भर्रा गया। इतने में वह लड़का उसकी बात काटते हुए गुस्से में बोेला - वरना, वरना क्या कर लोगी, बोलो (बीच-बीच में उसे छुने की कोशिश भी करता) क्या कर लोगी कौन आएगा बचाने हम अपने पर आ गये ना तो किसी को मुंह दिखाने के लायक भी ना बचोगी।
तभी उसने देखा कि बाकी लड़के उसी की तरफ आ रहे है। वह दौड़ कर गेट पर पहुंच गयी। उसने तय कर लिया था कि जरूरत पड़ी तो वह ट्रेन से कूद जाएगी। वह रोते हुए बोली- अगर तुम लोग आगे बढ़े तो कूद जाउंगी। लड़कों को जैसे मजा आ रहा था। वे उसकी तरफ बढ़े तो वह फिर बोली- मैं कूद जाऊगी। तब तक जग्गौर स्टेशन आ गया और वह तेजी से उतर कर दूसरे डिब्बे में आ गयी और फफक-फफक कर रोती रही। मैं भी उसी डिब्बे में बैठा था। मैं उसे छोड़ने उसके घर गया तब जाकर सारी बातें मालूम चली। इस घटना का असर इतना बुरा हुआ कि वह एक हफ्ते तक घर से बाहर नहीं निकली यहां तक कि प्रेक्टिकल इम्तिहान तक छोड़ दिया। ट्रेन से अप-डाउन करने वाले लोग बताते थे कि दो साल पहले एक लड़की ने ऐसी ही किसी वजह से ट्रेन से कूदकर जान दे दी थी | वाकर्इ ऐसी घटनाए अप-डाउन करने वाली लड़कियों की हिम्ममत चूर-चूर कर देती है।


प्रस्तुति-  जय सिंह

       जानकीपुरम, लखनऊ 


मोबाइल न0- 9450437630